Sunday, November 17th, 2019
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कहानी आत्मग्लानि - भाग 1 : लेखिका सीमा अग्रावाल

आत्मग्लानि - भाग 1

Seema-Agarwal-poetess,Seema Agrawal writer, writer Seema Agrawal,story written Seema Agrawalसंस्कार की बात सुन कर प्रज्ञा की नसों में मानो खून जम सा गया था। पिछले दिनों गुज़री घटनाएँ, बातें, दृश्य सब उसके जहन में भंवर के तेज़ी से घूमते हुए पानी की तरह घूमने लगे। घूमते हुए वक्त की उस तली तक पहुँचने की कोशिश करने लगे जहां से वो उगे थे। हर दृश्य का अर्थ आज की स्थिति के संदर्भ में बिलकुल उलट होता जा रहा था। प्रज्ञा पिछले हर दृश्य में छिपे इशारे को पढ़ने की कोशिश कर रही थी। बुत बनी बैठी दीवार की तरफ ताकती प्रज्ञा ने भर्राए हुए गले से संस्कार को कमरे से बाहर जाने को कहा। संस्कार जो उसका हाथ थामे उसके पास ही बैठा था, उसकी मनःस्थिति को समझते हुए धीरे से उठा और उसके गाल पर हल्की सी चपत मार कर ये कहता हुआ कमरे से बाहर चला गया --

"माँ, ज्यादा परेशान होने की ज़रुरत नहीं है, जल्दी आ जाओ भूख लग रही है"

दरअसल प्रज्ञा का तो मन हो रहा था कि वो संस्कार से लिपट कर खूब रो ले पर वो हमेशा की तरह आज भी अपनी भावनाओं पर काबू पाने में सफल रही। हाँ छिपाती ही तो आ रही थी वो पिछले ३० सालों से स्वयं को अपने आप से और सभी से। हमेशा हंसती, खुशी बिखराती प्रज्ञा, सबका एक-एक काम हाथो हाथ करती प्रज्ञा, पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों को निभाती प्रज्ञा। विवेक ने भी उसकी खुशियों को पूरा करने में भी कभी कोई कोताही नहीं की थी। व्यस्त रहने बावजूद उसने प्रज्ञा को उसके हिस्से का समय देने में कभी कोई लापरवाही नहीं बरती। प्यार तो इतना दिया था कि दो साल पहले हुए उसके निधन के बाद प्रज्ञा अभी भी हर घड़ी उसे अपने करीब ही महसूस करती थी|

विवेक शहर का एक बहुत नामी हृदय रोग विशेषज्ञ था। उनके छोटे से परिवार में एक बेटा संस्कार, बेटी संस्कृति, और सास-ससुर थे। सास-ससुर शादी के १५ साल तक साथ रहे फिर एक साल के अंतर  में पहले सास और फिर ससुर भी चल बसे। विवेक एक डॉक्टर तो था ही साथ ही कई सामाजिक संस्थाओं से भी जुडा हुआ था जिसके कारण घर में हमेशा लोगों का आना जाना बना रहता था| रिश्तेदारों को भी स्वास्थ्य संबंधी कोई परेशानी हो तो वो डॉक्टर होने के नाते विवेक को ही याद करते थे प्रज्ञा और विवेक के सहयोगी और प्रेमी स्वभाव के कारण कभी किसी को उनके पास मदद के लिए आने में संकोच नहीं होता था| पूरे दिन गज़ब की व्यस्तता के बावजूद प्रज्ञा  के चेहरे से मुस्कराहट कभी नहीं हटती थी|

शादी के बाद पहले दिन विवेक ने प्रज्ञा  का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा था --

" प्रज्ञा मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूंगा कि तुम्हें कभी कोई कमी नहीं होने दूँ, फिर भी यदि तुम्हें कुछ चाहिए तो अपने मन की बात कभी अपने मन में मत रखना, मुझे बताना ज़रूर |"

और सच ही में विवेक ने उसकी हर ख्वाहिश बिना किसी सवाल के पूरी की थी| पर क्या  प्रज्ञा ने अपनी ख्वाहिशें हमेशा ही नाप-तोल कर नहीं रखीं थीं, उसने ऐसी कोई ख्वाहिश की ही कहाँ थी कभी जिससे किसी की कोई भी जरूरत बाधित हो सकती थी| न जाने मन का वो कौन सा कोना था जिसे वो खुद ही कभी नहीं पढ़ पायी थी|  एक अनजानी सी रिक्तता का अहसास अक्सर उसे घेर लेता था जिसे वो खुद भी परिभाषित नहीं कर सकी थी कभी भी| और विवेक जिसका दावा था ---

"प्रज्ञा डियर तुम कुछ न भी बोलो तो भी मै तुम्हारी साँसों के सहारे तुम्हारे मन तक पहुँच सकता हूँ|"

वो भी कहाँ जान  सका था उसके मन के उस छुपे हुए कोने को या उसने कभी जानना ही नहीं चाहा| उस कोने को टटोला भी तो किसने? उसकी उम्र के 53  साल बाद उसके जीवन  से जुडी उसकी बहु सौम्या ने| हतप्रभ थी वो सब कुछ जानने के बाद| किस प्रकार सौम्या ने सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से किया था| किस प्रकार उसने संस्कार को अपनी योजना का प्रतिभागी बनाया होगा|

प्रज्ञा की आँखों के सामने दो साल पुराने सभी दृश्य नाचने लगे| ये वो दृश्य थे जिन्होंने उसके आज के जीवन की नीव रखी थी| शिलान्यास किया था स्वयं उसकी बहू सौम्या ने| विवेक जो हृदय रोग विशेषज्ञ थे स्वयं ही अपने दिल का हाल नहीं समझ सके थे|  ५ घंटे तक चले एक ओपरेशन के बाद किसी के दिल को सुरक्षित कर जब वो ओपरेशन थिएटर से बाहर आये तो उन्हें कुछ उलझन सी महसूस हुयी| जिसका कारण उन्होंने थकान समझा और जल्दी से घर पहुँचने के लिए खुद ही ड्राइव करके हॉस्पिटल से घर के लिए रवाना हो गए| हॉस्पिटल घर से लगभग १५ किलोमीटर दूर था आधे रास्ते तक पहुँचने के बाद कब और कैसे ये सब घटित हुआ होगा किसी को नहीं पता चला प्रज्ञा के पास एक अजनबी का फोन आया जिसने विवेक को गाडी में अस्त-व्यस्त पडा देख विवेक के मोबाइल से ही फोन करके सूचना दी|

प्रज्ञा ने तुरंत संस्कार को फोन किया, साथ ही विवेक के हॉस्पिटल में फोन कर उन्हें तुरंत वहाँ पहुँचने का आग्रह किया| पता नहीं कैसे डूबते दिल के साथ वो इतना सब कर सकी थी|

गाडी में विवेक का सिर्फ शरीर मिला था, आत्मा तो न जाने कब की कूच कर चुकी थी| उसके हर सुख दुःख का साथी, उसका जीवन आधार, उसके जीने का मकसद सब कुछ लेकर विवेक एक झटके में ही उसको बिना बताये जा चुका था| पथराई आँखों से विवेक के हाथ को थामे वो बहुत देर तक बैठी रही| वो समझ नहीं पा रही थी उसकी साँसें कैसे चल रहीं हैं दिल क्यों धड़क रहा है शरीर में हलचल क्यों कर है, सब कुछ तो विवेक की वजह से ही था न, फिर उसके जाने के बाद भी वो जीवित कैसे है|

खबर हवा की तरह पूरे शहर में फ़ैल चुकी थी, बहुत से लोग जगह का पता करते करते वहाँ पहुँच चुके थे| विवेक को प्यार और सम्मान देने वालों की एक लंबी फेहरिस्त थी|

रात तक संस्कार और ससंकृति अपने-अपने परिवारों के साथ आ गये थे| बहू सौम्या ने आते ही घर का सारा इंतज़ाम कुशलता से संभाल लिया| संस्कार के दोनों बच्चे अपने बड़े पिता जी के बहुत लाडले थे| इस अचानक मिली खबर से वो दोनों बहुत सहमे हुए थे पर शायद रास्ते भर दी गयी सौम्या की नसीहतों ने उन्हें कुछ सहज कर दिया था|

सारे सामाजिक और धार्मिक रीति रिवाज़ समाप्त हो चुके थे| सौम्या घर के कामो के साथ-साथ उसका भी ध्यान रखती| संस्कृति अपने परिवार सहित वापस जा चुकी थी| आज २० दिन बीत चुके थे कल संस्कार भी वापस जा रहा था| प्रज्ञा का मन एक बार फिर विचलित हो उठा था .........

"कैसे रहेगी वो अकेली, नहीं नहीं इस घर में विवेक के बगैर रहने की वो कल्पना भी नहीं कर सकती| पर इतनी जल्दी यह जगह छोड़ भी तो नहीं सकती है| विवेक के बैंक एकाउंट्स, बचत सम्बन्धी खाते, प्रोविडेंट फंड आदि का हिसाब करते करते एक महीना तो लग ही जायेंगा| तब-तक तो यहीं रहना पड़ेगा|"

सौम्या और संस्कार उसे लगातार आश्वासन देते रहते थे कि सब ठीक हो जायेगा| संस्कार वापस चला गया पर सौम्या ने उसके साथ वापस जाने से मना कर दिया था| वो प्रज्ञा के पूरी तरह संभलने तक उसी के पास रुकना चाहती थी| बच्चों को अपनी नौकरानी फूली के साथ छोड़ कर वो निश्चिन्त थी| फूली बहुत समय से उसके साथ थी दोनों बच्चों को बचपन से उसी ने संभाला था|

संस्कार के जाने के बाद बस वो और सौम्या ही घर पर रह गए थे| संस्कार के विवाह के बाद यह पहला मौका था जब सौम्या इतने लम्बे समय तक उसके साथ थी| सौम्या विवाह के पहले से ही नौकरी करती थी और अपने कार्य के प्रति बहुत समर्पित थी| अतः कभी बहुत लम्बे समय का अवकाश ले कर नहीं आ सकी| संस्कार और सौम्या जिस शहर में थे वो ज्यादा दूर नहीं था इसलिए वो खुद ही बीच-बीच में उन दोनों के पास अपनी गाडी से चली जाया करती थी और एक-दो दिन रुक कर वापस आ जाती थी|  बहू होते हुए भी सौम्या के साथ उसे कोई अजनबीपन कभी महसूस नहीं हुआ| सॉफ्टवेर इनजीनियर सौम्या एक अच्छी कंपनी में सॉफ्टवेयर डेवलपर के पद पर कार्यरत थी| पर  इस बार सिर्फ प्रज्ञा की देखरेख के लिए उसने अवैतनिक अवकाश ले रखा था| धीरे धीरे दो महीने बीत गए सौम्या के साथ ने उसे संभलने में बहुत मदद की|

सौम्या उससे लगातार उसके बचपन की बातें बचपन के शौक आदि पूछती रहती| कल संस्कार आने वाला था सौम्या को वापस ले जाने, पर दोनों ने अभी तक उससे एक बार भी अपने साथ चलने के लिए नहीं कहा था| उसने मन ही मन ठान लिया था, संस्कार से वह कह देगी कि यहाँ के मकान और सामान का भी इंतज़ाम कर दे| वह यहाँ अकेली नहीं रहेगी| फिर भी स्वाभिमान रोक रहा था या एक इंतज़ार पता नहीं, वह चाहती थी कि यह बात संस्कार और सौम्या स्वयं उठाये|

संस्कार आया तो उसके साथ उनकी पुरानी नौकरानी फूली भी थी| संस्कार और सौम्या ने कहा.......
"मम्मी आप के अकेले रहने पर हमे चिंता रहेगी, इसलिए फूली आज से यही रहेगी आपके साथ और बीच बीच में हम लोग आते भी रहेंगे।"

प्रज्ञा अवाक सी संस्कार की बात सुन रही थी। संस्कार और सौम्या के किसी भी हावभाव या बात से उसे यह परिलक्षित नहीं हो रहा था कि यह व्यवस्था सिर्फ कुछ दिनों के लिए है या हमेशा के लिए। पूछना उसके स्वाभिमान ने गवारा नहीं किया, परंतु विवेक के जाने के एक महीने बाद आज वह फिर अपने आप को मानसिक रूप से अव्यवस्थित पा रही थी। उसे विश्वास नहीं हो रहा था की संस्कार इस स्थिति में भी उसे अकेले छोड़ कर जाने की बात सोच भी सकता है। एक क्षण में सौम्या  के साथ बिताए सारे आत्मीय पल भूल गई जिन्होंने उससे एक महीने में कुशलता पूर्वक कभी एक बेटी कभी एक माँ और कभी एक सहेली बनकर संभाला था। उसे सौम्या के इस दोहरे चरित्र पर विश्वास नहीं हो पा रहा था। जिसने उससे साफ़ शब्दों में कहा था...

"माँ अब आपको अकेले ही रहना है, संस्कार और मैं बीच बीच में आते रहेंगे। फूली के साथ आप कोई असुविधा महसूस नहीं करेंगी। वह बहुत होशियार है।"
प्रज्ञा  तड़प उठी थी.......... "इस तरह नौकरों के भरोसे क्या कोई माँ को छोड़ सकता है ?"

मन पूरी तरह टूटने लगा था, पर फिर भी वह संयत बनी हुई थी। शायद यह उसकी आदत में शामिल था कि परिस्थितियों को इस प्रकार स्वीकार किया जाए कि किसी को बात थोपने जैसी आत्मग्लानि ना हो।

संस्कार और सौम्या चले गए। अपने कहे अनुसार दोनों जल्दी जल्दी उससे मिलने आते रहते थे। उसने भी दोनों को कब सहजता से माफ कर दिया उसे स्वयं ही नहीं पता चला। फूली के साथ उसका रिश्ता खिलते खिलते इस हद तक पहुँच चुका था कि अब वो उसकी बेटी सी ही हो गई थी। कभी कभी संस्कृति उलाहना भी देती थी। 'माँ फूली को पाकर तुम तो मुझे ही भूल गई।' खाली समय काटे नहीं कटता था। विवेक के साथ हर रोज़ ही किसी न किसी समारोह में जाना रहता था। कभी कभी वह खीज कर कह उठती थी...

"कभी तो मुझे मेरे साथ भी रहने दिया करो।"

और विवेक हँस कर कहता था...

"यह तो मेरे जाने क बाद ही संभव हो सकता है।"

वह हमेशा उसकी इस बात पर नाराज़ होती थी पर न तो उसकी खीज की प्रतिक्रिया बदलती थी और ना ही उसकी प्रतिक्रिया पर विवेक की प्रतिक्रिया। पर आज यही खालीपन उसके लिए भार बना हुआ था। घर में काम नगण्य थे। किटी पार्टी में जाती थी पर वह भी महीने में एक बार होती थी। सहेलियों से मिल कर मन कुछ हल्का हो जाता था पर घर में घुसते ही फिर वही सन्नाटा पसर जाता।

अचानक एक दिन उसने देखा उसकी एक बहुत ही पुरानी डायरी जिसमे उसकी कुछ कविताएं कहानियाँ और आलेख थे उसकी साड़ियो पर रखी थी। पर उसने तो यहाँ नहीं रखी फिर कैसे? किसने उसे वहाँ रखा होगा। उसने पहला पन्ना पलटा। पलटते ही वह अतीत की गहरी धुंध में समां गई। कुछ दिख रहा था कुछ ओझल था। धीरे धीरे स्मृति की किरणों से वह धुंध हटाने की कोशिश करने लगी। उसकी कवितायें  कॉलेज में उसकी पहचान हुआ करती थी। कहानियाँ  भी अक्सर स्थानीय पत्र पत्रिकाओं में छपती रहती थी। मौहल्ले के बच्चे अक्सर उससे स्कूल में होने वाली प्रतियोगिताओं के लिए लेख लिखवा कर ले जाते थे। भाषा और सम्प्रेषण पर उसकी ज़बरदस्त पकड़ थी। एक एक कर उसने अपनी डायरी के पन्ना पढने शुरू किये। उसे लग ही नहीं रहा था कि यह सब उसी का लिखा हुआ है...........

"क्या वो फिर ऐसा लिख सकती है?, नहीं अब तो सब भूल चुकी है, संभव नहीं लगता कि अब कलम में फिर से वही रवानी आ सकेगी"

तभी फूली खाना ले कर आ गयी l प्रज्ञा बहुत उत्साह से उसे अपनी लिखी कवितायें सुनाने लगी l फूली उसके चेहरे को मुस्कुराती हुयी अपलक देख रही थी l फूली को अपने चेहरे को यूं ताकते हुआ पा वो तनिक बनावटी गुस्से से बोली...........

"कुछ समझ भी आ रहा है या यूं ही मुस्कुरा रही है, हे भगवान!! मैं भी किस मूर्ख के आगे अपना पोथा लेकर बैठ गयी l ये तो वही मसल हो गयी, भैंस के आगे बीन बजाओ भैंस खडी पगुराए "

फूली हडबडा गयी, फिर संभलते हुए बोली.......

"दीदी माँ, कविता पढ़ते समय आप मुझे इतनी खूबसूरत दिख रहीं थीं कि मैं कुछ सुन ही नहीं सकी l आपकी कविता तो आपके चेहरे पर चांदनी बन कर बिखर गयी थी l आप कविता लिखती हैं क्या?"

यह अंतिम वाक्य उसके सर पर हथौड़े की तरह पडा l लगा जैसे किसी ने अचानक ही उसे उसकी औकात बता दी थी l

"अब कहाँ लिखती है वो..... इस डायरी के पन्ने पलटे हुए ही उसे 30 साल गुज़र चुके होंगे"

तभी फूली की आवाज़ ने उसे इस मुश्किल से बाहर निकाला l फूली एक पेन और कागज़  लेकर उसके सामने खडी थी....

"दीदी माँ मेरे बारे में कोई कविता लिखिए न"

फूली के इस भोलेपन ने प्रज्ञा के चेहरे पर मुस्कराहट बिखरा दी, वो बोली....

"क्या लिखूं कुछ है भी तेरे में ऐसा जो लिखा जा सके"

फूली ने भी अब नाराज़ होने का नाटक करते हुए कहा...

"जाओ दीदी माँ आप भी....... अब जब तक आप मेरे लिए कुछ लिखती नहीं मैं खाना नही खाऊँगी, खाईये आप अकेले अकेले"

वो फूली के इस ड्रामे पर हँस पडी और जल्दी से चार पंक्तियाँ जोड़ते हुए बोली .....

"मुस्कान के जैसी हो , होंठों पे निखरती हो आशा की किरण बन कर आँखों में संवरती हो रूठो न मेरी बिटिया अब मान भी जाओं न आँगन में मेरे तुम तो खुशबू सी बिखरती हो"

फूली फिर उसके चेहरे को ताकने लगी...

"दीदी माँ इसका क्या मतलब हुआ, क्या मैं अच्छी नहीं हूँ? या बहुत अच्छी हूँ? "

उसने फूली को प्यार से अपने पास खींचते हुए कहा..........

"इसका मतलब ये है कि फूली एकदम पागल है"

इसके साथ ही दोनों जोर से हँस पडीं

पर एक चिंगारी  फूंक दी थी फूली ने अपने भोलेपन से उसके मन में l उसे आश्चर्य हो रहा था कि शब्द अब भी उसके पास हैं, भाव अब भी बह सकते हैं, कविता अब भी उसके भीतर कहीं छुपी थी l रात में बिस्तर पर पड़े-पड़े कितनी ही टूटी टूटी पंक्तियाँ मन में आती-जातीं रही, आकार लेती रहीं, कभी लगता दौड़ कर इसे कागज़ पर उतार दूं कभी सोचती.......

'अब ये सब उसके बस का नहीं है'

फिर भी उसने एक पंक्ति जो उसके मन को छू ही गयी कागज़ पर लिख दी l और सो गई l

अगले दिन वो उस कागज़ को पढ़ रही थी, पढ़ने के बाद उसे एक बार फिर महसूस हुआ नहीं अब यह सब वो नहीं कर सकती और बेमन से ही सही पर वो कागज़ को जैसे ही फेंकने लगी फूली ने वो कागज़ उसके हाथों से ले लिया और बोली....

"दीदी माँ हम तो अनपढ़ हैं l सिर्फ रोटी कमाने में ही जीवन गुज़र जाएगा, पर आप तो पढी लिखी होने के साथ-साथ एक ख़ास गुण की मालकिन भी हैं l भगवान सबको तो ऐसा नहीं बनाता l उस दाता ने आपको  हुनर का धन दिया है , आप उसकी इस भेंट को कूड़े में फेक कर उसका अपमान कर रही हैं l आपके पास जीवन का कितना अनुभव है उसे शब्दों में ढालिए न..... खाली बैठे बैठे जाने क्या का सोचती रहती हैं l सोचना ही है तो कुछ ऐसा सोचिये कि कविता बन कर कागज़ पर उतर आये "

वो आश्चर्य से फूली को बोलते हुए देख रही थी उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि ये फूली के ही शब्द हैं l  उस अनपढ़ फूली ने उसे मानो कर्म की गीता के पन्नो का साक्षात्कार ही करवा दिया था l उसकी आँखे नम हो उठीं उसने कागज़ को वापस खोला और उसकी सिलवटें दूर करते हुए धीरे से फूली के गालों पर हाथ रखते हुए बोली.....

"जा चाय ले आ "

फूली अपनी जीत पर इतराती हुयी रसोई घर की तरफ चल दी l धीरे धीरे आज, कल, परसों में तब्दील होते चले गए... दो साल जाने कब गुज़रे उसे पता ही नहीं चला कई बार तो फूली नाराज़ हो कर उसके हाथों से कलम छीन कर कहती.....

"दीदी माँ आप तो इस कविता की सुंरग में यूं समा गई हैं कि, कुछ देख ही नहीं पातीं है न मुझे और न समय l बहुत गलती हुयी... मैंने ही आपको इसमे बंद किया है"

पर वो फूली को कैसे बताती कि उसने प्रज्ञा को सुरंग से निकाल कर एक रोशनी से भरा खुला आसमान दे दिया है जहां से वो बेशुमार नज़ारे देख सकती थी फूल,पेड़,पक्षी,पहाड़,नदी,बादल,चाँद,सूरज सब उसके बहुत पास हो गए हैं l इन सबको वो शब्दों के ज़रिये अपने कागज़ में समेट लेना चाहती थी l उसकी कविताएं यदा कदा स्थानीय पत्रिकाओं में छपने लगी थीं संस्कार और सौम्या जब भी आते देर रात तक बैठकर उसकी कवितायें सुनते l सौम्या तो बहुत ही उत्साहित रहती l सौम्या का  इस तरह खुश होना उसे अजीब सा लगता l परन्तु वो कभी प्रत्यक्ष रूप से इसे ज़ाहिर नहीं करती l मन के किसी कोने में एक तिक्तता ज़रूर ठहरी हुई थी जो स्वयं से ही बात करती थी...............

"देखो सौम्या तुम मुझे अपने साथ नहीं ले जाना चाहती थी न... कोई बात नहीं अब मुझे तुम सब के सहारे की आवश्यकता भी नहीं है l"

To Be Continues......
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Seema-Agarwal-poetess,Seema Agrawal writer, writer Seema Agrawal,story written Seema Agrawalपरिचय.-:
सीमा अग्रवाल
लेखिका व् कवयित्री

सीमा अग्रवाल का मूल पैतृक स्थान कानपुर, उत्तर प्रदेश है l संगीत से स्नातक एवं मनोविज्ञान से परास्नातक करने के पश्चात पुस्तकालय विज्ञान से डिप्लोमा प्राप्त किया l आकाशवाणी कानपुर में कई वर्ष तक आकस्मिक उद्घोषिका के रूप में कार्य किया l विवाह पश्चात पूर्णरूप से घर गृहस्थी में संलग्न रहीं l पिछले कुछ वर्षों से लेखन कार्य में सक्रिय हैं l इन्ही कुछ वर्षों में काव्य की विभिन्न विधाओं में लिखने के साथ ही कुछ कहानियां और आलेख भी लिखे l

संपर्क -: मोबाइल नम्बर – : 7587233793 , E mail -: thinkpositive811@gmail.com लेखन क्षेत्र       : गीत एवं छंद, लघु कथा प्रकाशित  गीत संग्रह  : खुशबू सीली गलियों की

प्रकाशित कृतियाँ  : 1.   राजस्थान से प्रकाशित बाबूजी का भारत मित्र में दोहे एवं कुण्डलियाँ 2.   शुक्ति प्रकाशन द्वारा प्रकाशित संकलन “शुभम अस्तु” में गीत संकलित 3.   श्री दिनेश प्रभात द्वारा सम्पादित त्रैमासिक पत्रिका गीत गागर में गीत प्रकाशित 4.   मॉरिशस गाँधी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित वसंत एवं रिमझिम पत्रिकाओं में रचनाओ का प्रकाशन 5.   ई-पत्रिका “साहित्य रागिनी” में गीत संकलन

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