Saturday, November 16th, 2019
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कविता - मेरे हिस्से की भूख

- कवि  :   बृजमोहन स्वामी "बैरागी" - 

मैं ही वह बदनसीब रास्ता

हूं जो इक कुर्ते में

सदियों तक छिपा रहा।

मुझे समझो "कविता",

बेज़ुबान गहरी रातें

धारणाओं को तोड़ जाती हैं।

थोड़ा झांककर देखो,

मानवता को अलविदा कहते हैं

पिछली शदी के सबसे गरीब आदमी।

उदहारण और टिप्पणियाँ

इस दुनिया की सबसे क्रूर चीज़े

सबसे गहरा झूठ,

नरक के लिए मक्खियों जैसा

छिपा हो सकता है सबसे आसान जगह पर।

मेरे हिस्से की भूख

बहुत सस्ती है।

कि

"सवाल" , जवाब के रिस्तेदार नही हैं,

कई डरावने सपने

उखड़ती नींद

आलोचकों के बाहर कदमों की ध्वनि,

रोक सकती है आपकी गले की नसें।

मुंह के रास्ते किसी चीज़ को निगलने के लिए

नही चाहिए

देवता का हाथ।

क्योंकि तुम तो दो और दो चार वाली दुनिया में रहती हो।

जेब काटना

और गला छोड़ देना

बहुत उज्ज्वल प्रकाश की तरह,

एक अंतिम सत्य है।

चेतना के बाहर छोड़ दिया

मैंने इस साल का सबसे बढ़िया आंसू

आदमी, आदमी नही रहा,

तुम्हें कैसे समझाया जा सकता है

जबकि तुम सुनती कहाँ हो

सुनना, दिवार पर चिपका हुआ है।

यौन क्रिया की सारी विधि नही सिखाई जा सकती , एक दिन में

मानव शाश्त्र नही पढ़ा जा सकता, एक महीने में

और

मेहनत की रोटी नही खाई जा सकती एक शदी तक।

इंसान रोते हुए आता होगा

पर मुझे जहाँ तक पता है

जाता तो रो-रोकर है

जबकि

हँसी हमेशा जीतती है।

कि देखो एक आँख से,

समय बीत जाता है,

अवकाश तालिका आधी रात को अकेली

भोजन और नाश्ते के अतिथि मुख्य रूप से हत्यारे

मकड़ियों के सर पर बोझ

एक विशेष नियम के निर्माण के लिए

हत्याएं

ख़ुशी के माहौल काफी अकेले,

और यहां तक कि अजनबियों

का स्वाद कुछ नमकीन

आधुनिक आदमी परे चला जाता है।

तुम्हारी गाल पर उकेर लूँ

सांस्कृतिक पहचान का बयान या दावा,

तुम्हारे होंठ में रख दूँ

मेरा सबसे कीमती शब्द "नास्तिक"

कुछेक बुद्धिमान लोगों का दिमाग आइंस्टीन से अलग हो तो गलत अर्थ निकलता है।

साधारण जीवनस्तर का संकेत

अक्सर लाचार आँख के जरिये भी दिया जाता है

मसलन आधी रोटी खाकर

रोज़ गुजारा करना सिख लो।

मुझे मत पूछो उदहारण,

की ये सबसे क्रूर चीज़ है

उदाहरण के लिए,

लोग जानबूझकर बड़े आकार के मौखोटे पहन सकते हैं।

तुमने जितनी भी बातें परमात्मा के संबंध में कही हैं,

मेरे पेट पर लात मारकर ही कहीं है।

सूरज पूरी दुनिया के लिये,

पर मेरे रोशनदान से दिखता।

सुनो कविता,

जहां मैं अपने उपन्यास जलाकर आया

वहां एक आदमी मरना चाहता था।

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brijmohanbairagi,poet-brijmपरिचय -:
बृजमोहन स्वामी "बैरागी"
लेखक व् कवि
संपर्क - : Birjosyami@gmail.com
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