कविताएँ

1 जीवन

एक क्षण भी समय का
नहंी व्यर्थ होना चाहिए।
जिन्दगी जीने का कोई
अर्थ होना चाहिए।
रूप कैसा भी हो तन का
भाव मन के उच्च हो।
भावनाओं की धरा पर
मूल्य धन का तुच्छ हो।
त्याग, सेवा, समर्पण का
ध्येय होना चाहिए।
जिदंगी जीने का कोई
अर्थ होना चाहिए।
गम न हो इस बात का
कि, कुछ नहंी हमको मिला है।
अर्जित करें इससे सभी कुछ
कर्म करना चाहिए।
जिंदगी जीने का कोई
अर्थ होना चाहिए।
जो गिरे उनको उठाएॅं
राह मंजिल की दिखाऐं।
जिन्दगी के साकर को हम
साथ में तय कर दिखाएॅं
स्वयं को सबको द्वितैषी
बन दिखाना चाहिए।
जिंदगी जीने का कोई
अर्थ होना चाहिए।
कॉंटे घने हो राह में
फिर भी कमी न हो मजबूरियॉं
मंजिल की ना हो दूरियॉं।
जिंदगी की राह नंदन
खुद बनाना चाहिए।
जिंदगी जीने का कोई
अर्थ होना चाहिए।
एक क्षण भी समय का
नहीं व्यर्थ होना चाहिए।  जिन्दगी जीने…………।

 
2.  मुरझाना तो निश्चित है

यदि फूल खिला है।
दुःख का अनुभव भी निश्चित है,
सुख यदि मिला है।
पतझड़ है तो यह निश्चित है
एक दिन बहार भी आएगी।
है आज ग्रीष्म, कल सावन की,
निश्चित फुहार आएगी।
जो आज तिमिर की रातें हैं,
कल होगी चंदा की रातें।
जो आज घृणा की बातंे है
कल होगी प्रेम की सौगातें।
यदि जन्म लिया है धरती पर,
मरना भी धरा पर निश्चित है।
गुजरे हैं हर कठिनाई से
अब मंजिल पाना निश्चित है।
माना कि वक्त के हाथों हम,
मजबूर हुए हैं कई बार।
आकर करीब हम मजिल के,
फिर दूर हुए हैं कई बार।
हमने जिस जन का साथ दिया,
सब त्याग दिया जिसके खातिर।
वह अपना ही अब बाधा बन
राहों में बैठा है शातीर
हमनें अपनों को गैर कहा,
गैरों को अपनाया हमने।
जब मुश्किल आन पड़ी हम पर
हमकों तब ठुकराया सबने।
लेकिन दिल में आस अभी,
मंजिल को निश्चित पाएॅंगे।
ईश्वर के घर अंधेर नहंी,
दुःख के बादल छट जाऐंगे।

3  जीवन एक अमूल्य निधि

इसको हर क्षण अनमोल बनाओ।
आशावान बनो हरपल तुम,
बाधाओं से मत घबराओ।
तुम यदि चाहो तो जीवन में,
अद्वितीय भी बन सकते हो।
हर अवसर का लाभ उठकार
जो चाहो वह पा सकते हो।
सक्षम बनो अकेले ही तुम,
हर मुश्किल से तुम लड़ जाओ।
हर दुःख में हर सुख के पल में,
जीवन में उत्साह बढ़ाओ। जीवन…………।
संकट और दुःख दर्द, निराशा,
पर बुझ ना पाए अभिलाषा।
ज्ञान दीप, धीरज, साहस-बल,
से ज्योतिर्मय हो जिन आषा।
साथ अगर अपनों का ना हो
स्वयं सफल होकर दिखलाओ
सार्थक जीवन के मूल्यों को
सब कुछ खोकर भी तुम पाओ। जीवन…………।

4 भूख सत्ता की जिसे

दिन रात रहती हो सताए।
राजनीति में वहीं जन
देश का नाात कहाए।।
वस्त्र जितने शुभ्र, उतनी
आत्मा में गंदगी हो।
त्याग की मूरत बने पर
भोग की ही बंदगी हो।
राम का सेवक बने पर
काम का है जो पुजारी।
प्रेम धन से ही करे,
जनता भले ही हो दुखारी
प्यास से जनता मरे पर
दूध से नित ये नहाए।
राजनीति मे वहीं जन
देश का नेता कहाए।
रात दिन वादा करे कि
हम मिटाएॅंगे गरीबी ।
वस्त्र, भोजन और घर से
होगी जन-जन की करीबी।
ये गरीबों के हितों के
योजनाऐं है बनाते।
देश का धन, ये गरीबी
दूर करने में लगाते।
भूलकर निर्धन जनों को
महल अपने ये बनाएॅं
राजनीति में वही जन
देश का नेता कहाए।
धर्म जाति के बहाने,
तोड़ने मानव मनों को ।
दंगे, प्रदर्षन और हत्याकांड
प्रिय इन दुर्जनों को।
मंच पर ये देश के
उत्थान के वादे करे।
भूलकर ये देश हित, नित
जेब अपनी ही भरे।
लोक की हत्या करे
और तंत्र अपना जो चलाए।
राजनीति में वही जन
देष का नेता कहाए।

 

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नंद किशोर सोनी

शिक्षक ,लेखक व् कवि

षिक्षाः- एम.ए. हिन्दी, संस्कृत, इतिहास, बी एड, एमफिल व्यवसायः- शिक्षण पद:- प्राचार्य केन्द्रीय विद्यालय राजगढ़ (म.प्र.)

रूचिः-कविता, आलेख, लेख, निबंध, कहानी लेखन, जीवनमूल्य परक साहित्य, देषभक्ति व राष्ट्रीय साहित्य का अध्ययन व लेखन, हिन्दी साहित्य अकादमी म.प्र. भोपाल द्वारा नरेष मेहता के काव्य पाठ पर पुरस्कृत, हिन्दी साहित्य परिषद , इंदौर (म.प्र.) में युवा कवि के रूप में काव्यपाठ, अनेक स्थानीय काव्य गोष्ठियों, कवि सम्मेलनों आदि में काव्यपाठ ।

अनेक सामाजिक-सास्कृतिक कार्यक्रमों में अध्यक्ष, मुख्यअतिथि व मुख्य वक्ता के रूप में उद्बोधन।

विशेष – श्री कृष्ण सरल के काव्य में क्रांति चेतना पर षोध उपाधि – (एमफिल) देवीअहिल्या वि. वि. में प्रथम स्थान । – आधिनुक काव्य में राष्ट्रीय चेतना/क्रांति चेतना परष्षोध पत्र लेखन। – क्रांति कवि श्री कृष्ण सरल के साहित्य में क्रांति चेतना पर पी.एच.डी. उपाधि पर षोधरत।

3 COMMENTS

  1. जीवन के भावों को मोतियों की इस माला में क्या खूब संजोया है।

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