कविताएँ 

जोगी चाँद

यूँ खिड़की पर जो आते हो
मन जोगन से क्या पाते हो
न वचन कोई ना कोई सपना
ले खाली दामन ही जाते हो,
… फिर बोलो जोगी रोज-रोज
तुम खिड़की पर क्यों आते हो।
रमने को कँही क्या बास नहीं
क्या कोई भी तेरे पास नहीं
रोते हो तब भी भाते हो
ये दर्द सा कैसा गाते हो।
जब कुण्डी – ताले सोते हैं
दरवाजे ग़ाफ़िल होते हैं
तुम खिड़की पर आ जाते हो
और जी भर जब बतियाते हो
इस धुंधले काले आलम पर
तब धवल नदी सी बहती है
तुम दिल को बेहद भाते हो
शायद पहले के नाते हों।
जोगी तुम इक बात कहो
क्या तुमको नींद नहीं आती
या नींद से तुमको प्यारी हूँ
बचपन की जैसे यारी होऊं
कल आएगी जब फिर रैना
तुम जोगी तब ये भी कहना
ये जो तप कुंदन के फेरे हैं
क्या संग ही मेरे लेने हैं।
आज कही है जोगी मैंने
जो थी दिल में कुछ बातें
कल कहना कैसे दिन बीता
क्या-क्या दुनिया ने,की घातें।
यूँ रात में मेरी खिड़की पर
मैं जान गई क्युँ आते हो
क्युँ नैनों में तकते रहते हो
पर दूर जरा सा बहते हो…

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            जलती तीली

कभी मेरे पास
सिगरेट कँहा रहा
पर जलते ख्यालों से
इक सिगरेट
सुलगाना है
कि, जब छींटे बारिश के
उंगलियों को
होठो को ,
बदन के हर गोशे को भिगों दें,
भिंगो – भिंगो कर थका दें ,
कि, जब आँखों से कोई आस
बारिश का छाता ओढ़ कर
बेधड़क निकल पड़े ,
तो सिगरेट सुलगा कर
सुलगती कुछ चाहतों को
दिखाना चाहती हूँ, एक
जलती तीली |

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Poetess jyoti gupta, jyoti gupta Poetess, Poetess, jyoti guptaपरिचय – :

 ज्योति गुप्ता

लेखिका व् कवयित्री

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लेखन – : अख़बार, पत्रिका, ई-पत्रिका में

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            संपर्क-
निवास– बोरिंग रोड, पटना , E-mail – :  jtgupta9@gmail.com ,  Mob- : 9572418078

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11 COMMENTS

  1. वाह जलती सिगरेट जागा जोगी
    रात की प्यास है रात की प्यासी
    है अंधियारा भी सुखा सूखा
    सीली सीली है ये ज्योति 🙂

  2. “जोगी तुम इक बात कहो क्या तुमको नींद नहीं आती या नींद से तुमको प्यारी हूँ।”
    वाह वाह वाह ….बहुत उम्दा ॥

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