Thursday, February 27th, 2020

ओम प्रकाश नदीम की ग़ज़ल

कुछ समझ में नहीं आता कि मैं क्या क्या हो जाऊँ सब की ख्वाहिश है यही , उनके ही जैसा हो जाऊँ अब दिखावा ही मेरे जिस्म का पैराहन है अब अगर इसको उतारूँ तो तमाशा हो जाऊँ आप ने अपना बनाया तो बनाया ऐसा अब ये मुम्किन ही नहीं और किसी का हो जाऊँ तुमने पहले भी सज़ा दे के मज़ा पाया है तुम जो चाहो तो गुनहगार दुबारा हो जाऊँ कुछ बड़ा और बनूँ , ऐसी तमन्ना है , मगर और कुछ बन के बड़ा और न छोटा हो जाऊँ फिर मेरा कोई भी सपना , न रहेगा सपना मैं अगर काश तेरी आँख का सपना हो जाऊँ --------ओम प्रकाश नदीम Om Prakash Nadeemओम प्रकाश नदीम एकाउन्ट आफीसर, लखनऊ निवासी - फतहेपुर उ. प्र.

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