– निर्मल रानी  –

भारतीय जनता पार्टी इस समय देश के 29 राज्यों में से 21 राज्यों पर शासन कर रही है। निश्चित रूप से भारतीय जनता पार्टी का इतना राजनैतिक विस्तार देश में पहले कभी नहीं हुआ था। बेशक इन 21 राज्यों में त्रिपुरा,ज मू-कश्मीर गोआ व मणिपुर जैसे कुछ राज्य ऐसे भी हैं जहां वह बहुमत के बल पर नहीं बल्कि अप्राकृतिक राजनैतिक गठबंधन या जोड़-तोड़ व तिकड़माबज़ी के बल पर सत्तासीन हुई है। बहरहाल,जो भी हो यह सभी सरकारें संवैधानिक दायरे के अंतर्गत् गठित हुई हैं। भारतीय जनता पार्टी अपने जनाधार के विस्तार हेतु एक कारगर फ़ार्मूले पर अमल करते हुए यह प्रचारित करती रही है कि वह हिंदू धर्म की सबसे बड़ी हितैषी पार्टी है। वह अपने-आप को रामजन्म भूमि अयोध्या के राममंदिर के निर्माण का सपना देश के रामभक्तों को दिखाती है। वह स्वयं को गौवंश का रक्षक बताकर गौभक्तों से वोट मांगती है। इन बातों से यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि भाजपा को उन ग़ैर हिंदू मुद्दों की आवश्यकता नहीं जिन्हें साधने के लिए दूसरे ग़ैर भाजपाई राजनैतिक दल स्वतंत्रता से लेकर अब तक हमेशा प्रयत्नशील रहे हैं।
परंतु अपनी इस बहुसं यवादी राजनीति को साधने में भाजपा के नेताओं द्वारा यहां तक कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,भाजपा अध्यक्ष अमितशाह तथा उत्तर प्रदेश के मु यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित कई केंद्रीय मंत्रियों द्वारा मात्र चुनाव जीतने की ग़रज़ से कुछ ऐसी बातें की जाती हैं जो बहुसं य समाज में अल्पसं यकों के प्रति भय तथा नफ़रत पैदा करती हैं। यह और बात है कि कभी-कभी मतदाता ऐसे चुनावी हथकंडों को नकार देते हैं। परिणामस्वरूप न केवल ऐसे दुष्प्रचार करने वालों को मुंह की खानी पड़ती है बल्कि चुनावों में हार का मुंह भी देखना पड़ता है। सवाल यह है कि जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 अगस्त 2014 को लाल किले से अपने पहले संबोधन में ही देशवासियों से कुछ वर्षों के लिए सांप्रदायिकता को तिलांजली देकर देश के विकास के लिए एकजुट होने की अपील करते दिखाई देते हैं, क्या उत्तर प्रदेश के फ़तेहपुर विधानसभा क्षेत्र के चुनाव प्रचार में उन्हीं के मुंह से ईद और दीवाली के मध्य विद्युत आपूर्ति में अंतर करना और शमशान व कब्रिस्तान जैसे विषयों का ज़िक्र करना शोभा देता है? क्या प्रधानमंत्री की यह भाषा शैली उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगियों तथा पार्टी के सांसदों,विधायकों व पार्टी कार्यकर्ताओं को इस बात के लिए प्रोत्साहित नहीं करती कि किसी भी तरह देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की मुहिम तेज़ रखी जाए और इसी के बल पर सत्ता प्राप्त की जाए?

याद कीजिए 2015 में बिहार में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान जब कांग्रेस,जनता दल युनाईटेड तथा राष्ट्रीय जनता दल मिलकर चुनाव लड़ रहे थे उस समय भाजपा अध्यक्ष अमितशाह ने एक सार्वजनिक सभा में यही कहा था कि यदि बिहार में भाजपा हारी और महागठबंधन की जीत हुई तो पाकिस्तान में जमकर आतिशबाज़ी होगी।  उन्होंने भाजपा की हार को जंगलराज-2 की वापसी की संज्ञा भी दी थी। हद तो यह है कि शाह ने यह भी कहा था कि महागठबंधन की जीत से जेल में बंद गैंगस्टर मोह मद शहाबुद्दीन जैसे लोग जश्र मनाएंगे। शाह ने यह भी कहा था कि महागठबंधन पिछड़ों और दलितों के लिए निर्धारित आरक्षण का एक हिस्सा अल्पसं यकों को देने की साज़िश रच रहा है। इतना ही नहीं बल्कि उसी चुनाव में भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा राज्य में गाय को सजाकर तथा उससे गले मिलकर रोते-पीटते हुए कार्यकर्ता जुलूस निकालते थे तथा मतदाताओं को गौ माता की रक्षा करने का संकल्प दिलाने के साथ-साथ भाजपा को वोट देने की अपील करते थे। इन सब दुष्प्रचारों व चुनावी हथकंडों का परिणाम क्या निकला था वह देश ने भलीभांति देखा था। यह और बात है कि भाजपा ने अपना अंतिम शस्त्र चलाते हुए महागठबंधन की बनी-बनाई सरकार के नीतिश कुमार के नेतृत्व के बड़े धड़े को महागठबंधन से अलग करने में सफलता हासिल की।

ग़ैर ज़िमेदाराना तथा दुष्प्रचार करने वाले बयानों का सिलसिला अभी भी थमने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले दिनों योगी आदित्यनाथ बड़े ‘गर्व’ से यह कहते सुनाई दिए कि वे ईद नहीं मनाते क्योंकि वे हिंदू हैं और इसपर उन्हें गर्व है। हमारी सांझी संस्कृति में किसी भी धर्म का वह व्यक्ति दुर्भाग्यशाली ही समझा जाएगा जो एक-दूसरे के त्यौहारों को या तो मनाता नहीं या उसके बारे में जानता नहीं अथवा उसमें शरीक नहीं होता। परंतु योगी का यह बयान भी बहुसं यवादी कट्टरपंथी हिंदू मतों को अपने साथ जोड़ने के उद्देश्य से दिया गया था। इस बयान के चंद दिनों बाद ही उनके अपने संसदीय क्षेत्र गोरखपुर में पिछले दिनों लोकसभा चुनाव हुआ जिसमें उन्हें ऐसी हार का सामना करना पड़ा जिसके बारे में स्वयं योगी व उनकी पार्टी कल्पना भी नहीं कर सकती थी। यह चुनाव परिणाम योगी के अहंकार तथा उनके सांप्रदायिकता पूर्ण आचरण व वक्तव्यों का एक लोकतांत्रिक जवाब था। फूलपुर संसदीय सीट पर भी भाजपा ने बाहुबली अतीक अहमद को पिछले दरवाज़े से स्वतंत्र उ मीदवार के रूप में प्रत्याशी बनाकर अल्पसं यक मतों को विभाजित करने का खेल खेला। परंतु यह हथकंडा भी धराशायी हो गया और उपमु यमंत्री केशव मौर्या की सीट से भी हाथ धोना पड़ा।
बिहार के अररिया संसदीय सीट पर स्वर्गीय सांसद तसलीमुदीन के पुत्र सरफ़राज़ आलम आरजेडी के प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में थे। यहां भी भाजपा द्वारा पूरे क्षेत्र में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की पूरी कोशिश की गई। हद तो यह है कि केंद्रीय मंत्री गिरीराज सिंह ने तो अररिया लोकसभा सीट पर भाजपा के पराजित होने के बाद कुछ ऐसी विवादित बयान दिए जो राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से कतई न्यायसंगत नहीं। परंतु अफ़सोस की बात है कि इस तरह की बेलगाम बातें करने वालों से न तो कोई सवाल करने वाला है न ही इनके विरुद्ध कोई कार्रवाई करने वाला। गिरीराज सिंह ने अररिया में कहा था कि-‘अररिया केवल सीमावर्ती इलाका नहीं है,केवल नेपाल और बंगाल से जुड़ा नहीं है,एक कट्टरपंथी विचारधारा को उन्होंने (आरजेडी) ने जन्म दिया। यह बिहार के लिए ही नहीं बल्कि देश के लिए ख़तरा होगा। वह आतंकवादियों का गढ़ बनेगा’। इतना ही नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की ही तर्ज़ पर एक ऐसी वीडियो प्रचारित की गई जिसमें कथित रूप से अररिया में कुछ विशेष समुदाय के लोगों द्वारा पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाते हुए दिखाया गया था। इस वीडियो को लेकर मीडिया में अच्छी-ख़ासी बहस भी छिड़ गई और छद्म राष्ट्रवाद की बहस होने लगी। परंतु बाद में इस वीडियो के भी फ़र्ज़ी होने का समाचार प्राप्त हुआ।
मज़े की बात तो यह है कि ज मु-कश्मीर व नागालैंड में जहां भारतीय जनता पार्टी अलगाववादी विचारधारा रखने वाले राजनैतिक दलों व संगठनों के साथ सरकार बनाने में कोई परहेज़ नहीं करती वहीं भाजपा उन धर्मनिरपेक्षतावादी राजनैतिक दलों के प्रति मतदाताओं में भय पैदा करने के लिए उनपर आतंकी गठजोड़ या पाकिस्तानी होने का लेबल लगा देती है जो सीधेतौर पर भारतीय जनता पार्टी को चुनौती देते हैं या इनकी सांप्रदायिकतपूर्ण राजनीति की हकीकत को बेनकाब करते हैं। भाजपा अपने विरोधियों को राजनैतिक विरोधी समझने के बजाए राष्ट्रविरोधी,आतंकवाद समर्थक,पाकिस्तानपरस्त, आईएसआई व अलकायदा समर्थक, मुस्लिम तुष्टिकरण  करने वाला,देशद्रोही जैसे ‘प्रमाणपत्रों’ से नवाज़ती रहती है। परंतु इन सबके बावजूद उपचुनावों के परिणाम ने बकौल मीर तकी मीर यह साबित कर दिया कि-‘उलटी हो गईं सब तदबीरें। कुछ न दवा ने काम किया-। देखा,इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया?

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परिचय –:

निर्मल रानी

लेखिका व्  सामाजिक चिन्तिका

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर निर्मल रानी गत 15 वर्षों से देश के विभिन्न समाचारपत्रों, पत्रिकाओं व न्यूज़ वेबसाइट्स में सक्रिय रूप से स्तंभकार के रूप में लेखन कर रही हैं !

संपर्क -:
Nirmal Rani  :Jaf Cottage – 1885/2, Ranjit Nagar, Ambala City(Haryana)  Pin. 4003
Email :nirmalrani@gmail.com –  phone : 09729229728

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