लेखक  म्रदुल कपिल  कि कृति ” चीनी कितने चम्मच  ”  पुस्तक की सभी कहानियां आई एन वी सी न्यूज़ पर सिलसिलेवार प्रकाशित होंगी l

-चीनी कितने चम्मच पुस्तक की उन्नीसवीं कहानी -

____ ये दिल जो न होता बेचारा ____

mradul-kapil-story-by-mradul-kapil-articles-by-mradul-kapilmradul-kapilभाग :1 " मुर्गा और मुर्गी स्थान : रायबरेली जिले के एक कस्बे में बना ज्ञान भारतीय स्कूल का चौथा दर्जा दिनाँक : तारीख याद नही , सन 1999 . भूगोल के मास्सब रामबरन शर्मा ने क्लास में घुसते ही सब से पहले हमीं को खड़ा किया और 7 महासागरों के नाम सुनाने को बोले . ( रामबरन मास्सब हमारे लिए अमरीश पूरी तब से बन गए थे जब गलती से हमारे धक्के से उनकी साईकिल गिर गयी थी और उसकी कैची टेंढ़ी हो गयी थी , और भूगोल से तो हमरी दुश्मनी अनादि काल से जग जाहिर ही है ) महासागरों के नाम पर हमे सिर्फ प्रशांत महासागर का ही नाम याद था , क्यूकी प्रशांत हमारी कानपुर वाली बुआ जी के देवर के तीसरे बेटे का नाम था , नतीजन 4 मिनट बाद हम मास्साब की कुर्सी के बगल में मानव तन लिए हुए कुक्कड़ ( मुर्गा ) आकृति बना रहे थे। हमे उतना दर्द मानव मात्र से मुर्गा बन जाने का नही था , ( शायद दिन में एक बार मुर्गा बनाना हम अपनी नियति मान बैठे था ) ना ही सात में से 6 महासागरों का नाम भूल जाने का हमे गम था , जितना हमे देख कर नूतन का मुंह दबा के हँसने का था का दर्दो गम . " नूतन बाजपेयी " पढ़ने में ठीक थी और कभी गर गलती से गलती हो भी जाती थी तो कोई मास्साब उसे मुर्गा नही बनाते थे , सिर्फ एक दो छड़ी मार के बैठे देते थे। और हमे मुर्गा बने देख कर वो अपने 2 टूटे दाँत निकाल निकाल कर हँसती रहती थी , पता नही खुद को क्या समझती थी , खैर अब हमारी ज़िंदगी का सब से बड़ा घोषित अघोषित दुश्मन कोई था वो यही नूतन की बच्ची थी। और हमारे जीवन का एक मात्र उद्देश्य नूतन को कम से कम एक बार मुर्गा माफ़ी चाहूँगा मुर्गी बनवाना ही था , उस दिन छुट्टी के बाद हमने अपने जीवन का ये एक मात्र ध्येय अपने परम मित्र अभिषेक को बताया। पहले तो अभिषेक 1.18 मिनट हमे देखता रहा , फिर अपने स्याही वाले पेन से निकली स्याही से रंगी ऊँगली उठा कर बोला " अबे पाण्डेय तुम गए हो पगला , भला कोई मास्सब उसे काहे मुर्गा \मुर्गी बनएगे ? " " काहे पूरे दर्जा में हमी मुर्गा बनने और अंडा देने के लिए बने है क्या ? " हमे समझ नई आ रहा था की जब भगवान ने हमे इंसान बना ही दिया है तो ये शर्मवा भगवान का फैसला बदलने में काहे लगा है। " अबे पंडित रहोगे बकलोल ही , अबे नूतनवा कैसे मुर्गा बन सकती है , वो लड़की है और स्कर्ट पहनती है " अभिषेक ने बिलकुल निर्मल बाबा वाले अंदाज में हमे ज्ञान दिया . "…………अबे हाँ , हमे तो ये याद ही नही था " हमे लगा जैसे हमारी सारी उम्मीदे टूट गयी। लेकिन बाद में हम घंटो ये सोच कर हँसते रहे की अगर नूतन मुर्गा बनती तो कैसी लगती .

चार सालो बाद अब हम 8 वी में आ चुके थे ……, और बहुत कुछ बदल चुका था .

भाग २ : " खुशबू "

स्थान : रायबरेली जिले के एक कस्बे में बना ज्ञान भारतीय स्कूल का आठवा दर्जा दिनाँक : तारीख याद नही , दिन सोमवार सन 2003 3 दिन की छुट्टी के बाद आज स्कूल खुला था , हम अपनी आदत से मजबूर क्लास के गेट पर खड़े थे , ठीक 9 बज कर 57 मिनट पर नूतन आसमानी और सफ़ेद रंग के सूट को पहने खुले बालो से मेरे बगल से निकल गयी , उसके खुले बालो से निकली " चिक " शैम्पू की खुशबू मेरे जहन तक पहुंच गयी। दोस्तों ये वो दौर था जब हम " आर्यमान - ब्रम्हांड का रक्षक" के दौर से निकल कर " घर से निकलते ही , कुछ दूर चलते ही , रस्ते में ही है उसका घर " वाले रास्ते पर बढ़ चले थे , अब हम समझ चुके थे कि शक्तिमान ही गंगाधर है , अब हम चंपक से आगे वाया सुमन सौरभ , सरस सलिल की ओर अपने कदम बढ़ा चुके थे, अब तो हमे सुबह की स्कूल प्रार्थना में " वह सकती हमे दो दया निधे , कर्त्वय मार्ग पर डट जावे " की जगह " जादू है नशा है , मदहोशियाँ है " सुनाई देता था।

इन बहुत से छोटे बड़े परिवर्तनों के बीच में जो सब से बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन था वो ये की नूतन जो हमारी सब से बड़ी घोषित अघोषित दुश्मन थी वो अब हमारे लिए सब से खास बन चुकी थी , वैसे तो ये बदलाव 5 वी क्लास के अंत में तब आना शुरू हुआ था उस ने सब से छुपा कर एक मुट्ठी कचरी हमे दी थी ,6 वी क्लास में हम अपने आस पास के बदलाव को करीब से महसूस कर रहे थे , ये साला साल (2001 ) बड़ा उथल पथल वाला था साल के शुरू होते ही गुजरात में भूकंप आया तो जून में लिएंडर पेस और महेश भूपति की जोड़ी ने फ्रेंच ओपेन का युगल खिताब जीता , चीन को विश्व व्यापार संगठन में प्रवेश मिला और " ये दिल आशिकाना " देखते हुए हमे ये ज्ञान की हो न हो हम नूतन बाजपेयी से मोहब्बत कर बैठे है , ये हमारे जीवन की पहली आतंकवादी घटना थी ,जिसे कुछ आतंकवादियों ने (जिसमे से ज्यादातर अब 72 हूरो के पास है ) भारतीय संसद पर हमला कर के साबित भी कर दिया , खैर अब हमारे दिल को उसकी संसद को उसका अध्यक्ष मिल चूका था , लेकिन अभी इसकी आधिकारिक पुष्टि बाकी थी ,

सातवी क्लास के 3 महीने में हमने उनके इतिहास के रजिस्टर को ये कह कर माँगा की "प्रथम स्वतंत्रता संग्राम " का चैप्टर पूरा करना है , और उसी रात लालटेन की रौशनी में हमने ख़ुश्बू वाली रिफिल के पैन से अपने जीवन का प्रथम प्रेम पत्र लिखा ( जिसके २ पेजो में पूरी 26 गलतिया थी जो उसने हमे बाद में बताई थी ) और उनकी इतिहास के रजिस्टर के " हल्दी घाटी का युद्ध " वाले चैप्टर में रख दिया , जिसका जवाब उन्होंने तीन लाइनो की एक चिट में " भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के विस्तार के कारण " वाले चैप्टर में दिया , वो भी हमे पसंद करती है इसकी आधिकारिक पुष्टि हो गयी थी।

अब हम अपने आप को चंकी पाण्डेय का छोटा भाई मान कर प्रेम गली में अपने छोटे छोटे पैरो को बढ़ा चुके थे , क्लास में वो लड़कियों की तीसरी लाइन की सब से किनारे की और बैठती थी और हम लड़को की तीसरी लाइन के सब से किनारे पर , हमारा मुर्गा बनना अभी बदस्तूर जारी था पर अब नूतन को हमे मुर्गा बने देख कर बुरा लगता था और उनका बुरा लगना हमे जरा भी पसंद नही था , सप्ताह में 2 पत्रो का आदान प्रदान जरुरी था ,हमारे पत्रो में जँहा अल्ताफ रजा की या ट्रक के पीछे पढ़ी गयी शायरियाँ होती थी वहीं उनके पत्रो में " माँ ने कल दाल की कचौड़ियाँ बनाई थी , शेरू सिर्फ ब्रिटानिया बिस्किट खाता है " जैसी नितांत व्यवहारिक पंक्तिया होती थी ,

और इसी सब के बीच उनके जन्मदिन तारीख नजदीक आ गयी , उनके गिफ्ट हेतु धन उपार्जन के लिए हमने अपनी दर्जा 3 से 7 तक कॉपी किताबे ( बस चलता तो दर्जा 8 की भी ) बेच दी , बाद में पता चला की जिस रद्दी का वजन बढ़ाने के लिए हमने माँ की " निर्मला " और पिता जी की " आखरी जंग " उपन्यास बेच दी है वो अभी उन दोनों ने पूरी नही पढ़ी है ( जिसके लिए रात में " आठ के ठाट " के बाद पिता जी ने हमे जी भर के जुतियाया था ) और इस से मिले 87 रुपय से साईकिल से शहर जा कर " राजा सेठ की मशहूर दुकान " से 37 रुपय का रिया बिंदास सेंट ( बाद में पता चला ये सिर्फ जेंट्स का होता है ) एक गुलाबी रुमाल और लाल रंग का दिल के आकर का ग्रीटिंग लए थे , उस ग्रीटिंग को रखने का उचित न स्थान होने के कारण नूतन ने लेने से मना कर दिया था ( बाद में मेरे मेरे भांजे ने उस ग्रीटिंग का जहाज बना कर पानी में चलाया था ) . इन सब बड़ी बड़ी बातो के बीच मैं एक छोटी सी बात भूल गया था की हमारा स्कूल आठवी तक ही है ,

और लास्ट एग्जाम के 3 दिन मिले पत्र में नूतन ने बताया की उनके पापा का ट्रांसफर किसी बड़े शहर में हो गया है .

भाग 3 ; " सफर "

========================= स्थान : कानपुर से लालगंज रायबरेली जा रही सरकारी बस दिनाँक : 9 मई 2015 मै कंडक्टर की साइड में पाँचवी सीट पर बैठा था , अभी अभी 10 रूपए के 4 पेन बेचने वाले की आवाज से मै जगा था , जागने के बाद मैंने आस पास के हालातो का जायजा लिया , बस में जितने लोग बैठे थे लगभग उतने ही लोग खड़े थे , बस अचलगंज पहुँचने वाली थी , जीवन के 45 से अधिक वर्ष देख चुकी उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बस टूटी सड़क पर नदीम श्रवण का संगीत पैदा कर रही थी ,बस में लोग पँचयात चुनाव से ले कर ओबामा की इराक नीति तक पर चर्चा कर रहे थे , मेरे बगल में बैठे चाचा निर्विकार भाव से " छोटा बालक " बीड़ी के कश ले रहे थे।

कल शाम जब माँ ने बताया था कि मुझे एक दूर के एक रिश्तेदार की तेरहवी में शामिल होने के लिए लालगंज जाना है तो मैंने तुरंत जा कर सबसे पहले चेहरे पर शहनाज़ की मसाज करायी और सुबह 7 बजे बजे पैंटालून से 40+20 % ऑफ पर ली गयी जींस शर्ट पहन कर लालगंज के लिए निकल लिया

लालगंज ही वो कस्बा था जंहा मैंने पहली बार जाना था कि प्यार नामक अनुभूति हम जैसे सामान्य इंसानो को भी होती है , यही मै अपने पहले प्यार " नूतन " से मिला था , जाने क्यों लालगंज के नाम पर दिल धड़क उठता है। मुझे आज भी अपनी आठवी का आखिरी पेपर और नूतन से हुयी आखरी मुलाकात याद है।

हमेशा की तरह हमारा आखरी पेपर कला का था , मैं तीन सालो से बनाता आ रहा स्वच्छ घर और साड़ी की किनारी पुरे 2 घंटे तक बनाता रहा था , जबकि बाकी सारे लड़के लडकिया 50 मिनट में ही कॉपी जमा करके जा चुके थे और दुबे मास्साब हमारी और नूतन की कॉपी जमा करने क़ा इंतिजार करते करते सीट पर ही सो गए थे। कॉपी जमा करने के बाद हम स्कूल के पीछे वाले कमरे में मिले थे , उस दिन नूतन ने लाल रंग का सूट पहना था , और मैंने पहली बार किसी लड़की को छुआ था और रोते रोते उसके माथे को चूमा था

( सुनील शेट्टी वाले अंदाज में , क्युकी तब तक हमारे सवर्ज्ञ श्रीमत इमरान हाशमी जी का हमारे जीवन पर प्रभाव नही पड़ा था ) पहली बार उसे इतने करीब से उसे देखने पर ये जाना था की उसके टूटे 2 दांतो में से एक अब तक नही निकला ( जिसका कारण उसने ये बताया था की उस वाले दाँत के टूटने पर वो उसे चूहे के बिल में नही डाल पायी थी जिसकी वजह से वो दांत अब तक नही निकला) मेरे दिए गए " बिंदास " सेंट ( जो की जेंट्स था ) को उसने लगा रखा था , उसने गले में शायद पाण्ड्स ( मोगरा फ्लेवर ) लगाया था और बालो से चिक शैम्पू के जानी पहचानी खुशबू आ रही थी , उस खुशबू का अश्क मेरे जहन में ऐसा बसा की उसे अरमानी , बरबरी और लिवोन के विलायती परफ्यूम भी न मिटा पाये , उसे उस शहर का नाम भी नही मालूम था जँहा वो जा रही थी , खैर मुझे कभी न भूलने और खत लिखने का वायदा करके वो हरदम के लिए चली गयी। ( मै खत का इंतिजार करता रहा बिना ये सोचे की मैंने उसे अपने घर का पता दिया ही कब था ) कुछ महीनो तक डाकिये के घर आने पर सारे डाक मै ही लेता रहा , फिर हाईस्कूल , इंटर , ग्रेजुएशन , मैनजमेंट ,बदलते शहर , टारगेट , टीम , प्रमोशन , मकान ,मिसिंग , फेसबुक के दौर में सब पीछे छूट गया , हाँ अब भी जब कभी फेसबुक में कोई नूतन नाम का दीखता तो उसे फ़्रैंड रिकवेस्ट जरूर भेजता , उस के बाद भी बहुत सी लड़कियाँ जीवन में आई और गयी भी , अब मै प्यार का प्रोफेशनल खिलाडी बन चूका था , उसके बाद भी प्यार हुआ , सपने देखे , लेकिन फिर किसी के बालो में मुझे वो चिक शैम्पू की खुशबू न मिल सकी , व्हट्सप्प और फेसबुक के संदेशो में ख़ुश्बू वाली रिफिल के पैन की गंध न थी , फिर किसी को चूमने से पहले मेरे हाथ पैर न कांपे थे। २ साल पहले अभिषेक ने बतया था की उसको कंही से पता चला है की नूतन की शादी हुए 3 साल हो गए है और उसे एक बच्ची भी है। बस लालगंज के पास ही किसी छोटे से ढाबे पर रुकी थी ( कसम से उसके समोसे बड़े टेस्टी थे ) समोसा खाने और चाय पीने के बाद मैंने अपने फेवरेट ब्रांड क्लासिक रेगुलर की सिगरेट न मिलने पर पनामा से खुद को बहलाया और बस में आगे के सफर के लिए बढ़ गया , सिगरेट की गंध मिटाने के लिए मैंने एक च्विंगम को अपने मुँह की ओर बढाया और तभी एक छोटे से नरम हाथ ने उसे छीन लिया , (मै यादो में इतना खो गया था मुझे पता ही न चला की कब बीघापुर में मेरे बगल वाली सीट से चाचा उतर गए थे और एक मोहतरमा अपनी 4 साल की बच्ची के साथ उसमे आ बैठी थी ) और उसी बच्ची ने मेरे हाथ से वो च्विंगम छीना था , मैंने गौर से उस 4 साल की बच्ची को देखा और मेरी धड़कने थम गयी , वो हूबहू मेरी नूतन का छोटा रूप थी , वंही छोटी छोटी गोल सी आँखे , हल्के सुनहले बाल , छोटी सी नाक सब कुछ नूतन जैसा। तो क्या मेरे बगल में बैठी महिला नूतन है ? जिस से मै बीते 12 साल से तलाश रहा हूँ क्या वो मेरी बगल वाली सीट में बैठी है ? अगर ये नूतन हुयी तो क्या बोलूंगा मैं इस से ? क्या इसके साथ में इसका पति भी होगा ? पता नही कितने सवालो के भंवर में उलझा मै अपनी बगल वाली सीट पर बैठी महिला पर एक चोर नजर डाल रहा था , गहरी हरी साड़ी में लिपटी उस महिला ने घूंघट से अपना आधा चेहरा बंद कर रखा था , और खिड़की से बाहर की और देख रही थी , मै फैसला न कर सका का की वो मेरी नूतन ही है कि कोई और अनजान महिला , मै पुरे 14 मिनट तक अपलक उसे देखता रहा पर कोई फैसला न कर सका ( इन 14 मिनट मैंने पुरे 84लाख देवी देवताओ से प्रार्थना भी कर ली की वो नूतन ही हो , दरगाह , गुरुद्वारे सब जगह के टूर प्लान कर लिए बस वो एक बार नूतन की झलक दिखा दे )

इस बीच बस " ज्ञान भारती स्कूल " के सामने से होती हुयी गुजरी ( कौन जाने आज भी वंहा किसी के बीच मुर्गा / मुर्गी की लड़ाई चल रही हो , प्लासी के युद्ध और ईस्ट इण्डिया कम्पनी वाले चैप्टरो में दबे खत किसी प्रेम कहानी को जन्म दे रहे हो )

मेरा बस स्टॉप आ गया था , उस महिला ने अपना घूंघट कम किया और खिड़की से नजरे हटा कर बस कंडक्टर से अपनी टिकट में बचे 7 रूपए मांगे ,और मेरे लिए क़यामत आते आते रुक गयी वो नूतन नही कोई और थी , मैंने अपनी जेब से निकाल कर सुबह का बचा आधा रजनीगंधा खया और ये सोचते हुए बस से उतर गया क्या की पता नही उसका टुटा दाँत अब तक निकला होगा भी या नही ??

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mradul-kapilwriter-mradul-kapilmradul-kapil-writer-author-mradul-kapilmradul-kapil-invc-news-mradul-kapil-storyपरिचय – :
म्रदुल कपिल
लेखक व् विचारक

18 जुलाई 1989 को जब मैंने रायबरेली ( उत्तर प्रदेश ) एक छोटे से गाँव में पैदा हुआ तो तब  दुनियां भी शायद हम जैसी मासूम रही होगी . वक्त के साथ साथ मेरी और दुनियां दोनों की मासूमियत गुम होती गयी . और मै जैसी दुनियां  देखता गया उसे वैसे ही अपने अफ्फाजो में ढालता गया .  ग्रेजुएशन , मैनेजमेंट , वकालत पढने के साथ के साथ साथ छोटी बड़ी कम्पनियों के ख्वाब भी अपने बैग में भर कर बेचता रहा . अब पिछले कुछ सालो से एक बड़ी  हाऊसिंग  कंपनी में मार्केटिंग मैनेजर हूँ . और  अब भी ख्वाबो का कारोबार कर रहा हूँ . अपने कैरियर की शुरुवात देश की राजधानी से करने के बाद अब माँ –पापा के साथ स्थायी डेरा बसेरा कानपुर में है l

पढाई , रोजी रोजगार , प्यार परिवार के बीच कब कलमघसीटा ( लेखक ) बन बैठा यकीं जानिए खुद को भी नही पता . लिखना मेरे लिए जरिया  है खुद से मिलने का . शुरुवात शौकिया तौर पर फेसबुकिया लेखक  के रूप में हुयी , लोग पसंद करते रहे , कुछ पाठक ( हम तो सच्ची  ही मानेगे ) तारीफ भी करते रहे , और फेसबुक से शुरू हुआ लेखन का  सफर ब्लाग , इ-पत्रिकाओ और प्रिंट पत्रिकाओ ,समाचारपत्रो ,  वेबसाइट्स से होता हुआ मेरी “ पहली पुस्तक “तक  आ पहुंचा है . और हाँ ! इस दौरान कुछ सम्मान और पुरुस्कार  भी मिल गए . पर सब से पड़ा सम्मान मिला आप पाठको  अपार स्नेह और प्रोत्साहन . “ जिस्म की बात नही है “ की हर कहानी आपकी जिंदगी का हिस्सा है . इसका  हर पात्र , हर घटना जुडी हुयी है आपकी जिंदगी की किसी देखी अनदेखी  डोर से . “ जिस्म की बात नही है “ की 24 कहनियाँ आयाम है हमारी 24 घंटे अनवरत चलती  जिंदगी का .