Wednesday, November 20th, 2019
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उधमपुर- कटरा रेलवे लाइन : सच्चाई के आईने में

रंजीता ठाकुर{ रंजीता ठाकुर } प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी शुक्रवार को उधमपुर—कटरा रेलवे लाइन को राष्ट्र को समर्पित करेंगे। 25 किमी लंबी इस रेलवे लाइन को पूरा करने में करीब 18 साल का लंबा समय लगा है। इसकी वजह यह थी कि इस लाइन पर बनाई गई दस सुरंगों में से एक में लगातार पानी रिसता था। इस कमी को दूर करने के लिए सभी संभव प्रयास किये गए लेकिन उसके बाद भी यह पता नहीं चल पाया था कि पानी कहां से निकल रहा है। हालांकि अंत में विदेशी इंजीनियरों के साथ मिलकर इस समस्या को निदान भी ढूंढ लिया। करीब 11 सौ करोड़ रूपये की लागत से तैयार इस रेलवे लाइन के शुरू हो जाने के बाद मां वैष्णों देवी की यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालु दिल्ली से सीधे कटरा तक रेल से पहुंच पाएंगे। पहले उन्हें जम्मू या उधमपुर पर उतरकर वहां से वाया सड़क मार्ग कटरा तक जाना होता था। मां वैष्णों देवी के दर्शन के लिए बेस कैंप कटरा ही है। वहीं से यात्रा की चढ़ाई शुरू होती है। अगर उधमपुर—कटरा रेलवे लाइन की बात करें तो यह मार्ग कई खासियत सेभरपूर है। इस रेलवे लाइन पर 50 पुल है। इसके अलावा इस मार्ग में 10 सुरंग है। यहां पर बने एक पुल की उंचाई 85 मीटर है। यह कुतुब मीनार की उंचाई 73 मीटर से भी अधिक है। इसकी कुल लंबाई 308 मीटर है। इस मार्ग पर पड़ने वाली सुरंगों की लंबाई भी करीब 10.936 किमी है। इस मार्ग पर कुल 2 स्टेशन हैं। उधमपुर—कटरा रेलवे लाइन जो 25.624 किमी है, इसकी शुरुआत 1996—97 में हुई थी। उस समय इसकी लागत 183.28 करोड़ रूपये आंकी गई थी। वहीं अब जब यह प्रोजेक्ट संपन्न हो रहा है तो यह लागत 1090 करोड़ रूपये पर पहुंच गयी। लेकिन यह प्रोजेक्ट रेलवे के इतिहास में एक मील का पत्थर बन गया है। इस प्रोजेक्ट में रेलवे ने यह जाना कि जब किसी कच्चे पहाड़ से लगातार पानी निकलता है तो उससे निपटने के लिए किस तरह की तकनीक का इस्तेमाल किया जाए। इस मार्ग पर आधा सफर क्योंकि सुरंग में है इसलिए इनमें सुरक्षा के इंतजाम भी खास किए गए हैं। सुरंग में सुरक्षा के लिए विंड वेलोसिटी सेंसर, ट्रेन लोकेशन सेंसर, फायर फायटिंग सिस्टम—इंक्यूपमेंट, डायरेक्शन बोर्ड, ऑटोमैटेड हूटर जैसी तकनीक के अलावा इस पूरे मार्ग पर चौबीस घंटे रेलवेसुरक्षा बल और रेल राज्य पुलिस, जीआरपी, को तैनात किया गया है। जम्मू-कश्मीर रेल लाइन उधमपुर—कटरा रेल लाइन सरकार की महत्वाकांक्षी कश्मीर रेल परियोजना का हिस्सा है। इसके तहत कश्मीर को शेष भारत से रेल नेटवर्क से जोड़ने का निश्चय किया गया था। यह प्रोजेक्ट मौजूदा रूप में मूल रूप से अस्सी के दशक में सोचा गया था। हालांकि इससे भी पहले 19 वीं शताब्दी में जम्मू—कश्मीर के तत्कालीन राजामहाराजा प्रताप सिहं ने जम्मू और कश्मीर को जोड़ने के लिए रेल लाइन बिछाने की योजना बनाई थी। लेकिन इसमें लगने वाली भारी लागत और परिश्रम और उसकेलिहाज से इस लाइन की कम उपयोगिता को देखते हुए उन्होंने इस पर अमल को टालदिया। केंद्र सरकार ने जब अस्सी के दशक में इस योजना को तैयार किया तो पहले—पहल इसको लेकर काफी तेजी से काम हुआ।  लेकिन फिर इसको लेकर कार्य थोड़ा धीमा हो गया। इसके बाद सरकार ने इस परियोजना की महत्ता को देखते हुए इसे राष्ट्रीय परियोजना के तौर पर मान्यता दी। इसका तात्पर्य यह हुआ कि बजट में इसके कार्य को लेकर पैसे की कमी नहीं रहने दी जाएगी। यह रेल लाइन कुल 326 किमी लंबी है। यह जम्मू—उधमपुर—कटरा—काजीकुंड—बारामूला रेल लाइन के तौर पर चिन्हित की गई है। यह हिमालय की पीर पंजाल श्रृंखला से होकर गुजरने वाली आजाद भारत के इतिहास में पहली ऐसी बड़ी परियोजना है, जिसमें इतने बड़े स्तर पर किसी पर्वत श्रृंखला में निर्माण कार्य हो रहा हो। योजना की विशालता और इसके कार्य की जटिलताओं को देखते हुए इसे तीन हिस्से में बांटकर इसका कार्य शुरू किया गया। इसके तहत पहले चरण में मैदानी इलाकों में निर्माण का निश्चय किया गया। इसके तहत जम्मू—उधमपुर के बीच 55 किमी की रेल लाइन का कार्य पूरा करते हुए अप्रैल2005 में इसे जनता को समर्पित कर दिया गया। इसके साथ ही काजीकुंड—बारामूला के बीच 118 किमी के कार्य को भी पूरा करते हुए इसे तीन चरणों में जनता के लिए खोल दिया गया। यह क्योंकि मैदानी इलाके में है इसलिए इस रेल सेक्शन पर कोई सुरंग नहीं है। जिन तीन हिस्सों में इसे जनता के लिए खोला गया उसमें अनंतनाग—माजहोम के बीच 68 किमी लाइन को 11 अक्टूबर 2008 को जनता के लिए खोला गया। मजहोम—बारामूला, 32 किमी, के बीच रेलवे परिचालन 14 फरवरी 2009 को खोला गया। जबकि इस खंड के तीसरे हिस्से काजीकुंड—अनंतनाग, 18 किमी, के बीच रेल परिचालन 28 अक्टूबर 2009 को शुरू किया गया। इसी तरह काजीकुंड—बनिहाल के बीच 17.70 किमी के रेल सेक्शन को 26 जून 2013 को जनता के लिए खोला गया। इस सेक्शन पर सबसे लंबी यातायात सुरंग भी है। यह करीब 11.30 किमी लंबी है। यह खंड भारतीय रेलवे के सबसे दुर्गम मार्ग में से एक है। इस महत्वपूर्ण रेल परियोजना के एक अन्य खंड कटरा—बनिहाल के बीच 110.30 किमी का मार्ग अपने निर्माण के विभिन्न चरणों में है। रेलवे के एक अधिकारी के मुताबिक इस रेल मार्ग को चार प्रमुख खंड में विभाजित किया जा सकता है। इसमें से उधमपुर—कटरा का 25किमी का रेल मार्ग है। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 4 जुलाई 2014 को राष्ट्र को समर्पित करने वाले हैं। इसके अलावा कटरा—बनिहाल के बीच 110.30 किमी का खंड है। यह अपने निर्माण के कई चरणों में है। तीसरा खंड बनिहाल—काजीकुंड के बीच 17.70किमी है। यह मार्ग जनता के लिए खुल चुका है। वहीं चौथा खंड काजीकुंड—बारामूला के बीच 118 किमी का है। इस खंड का कार्य भी पूरा हो चुका है और इसे जनता के लिए खोल दिया गया है। इस रेलवे लाइन के लिए जमीन अधिग्रहित करते हुए यह निश्चय किया गया था कि ऐसे परिवार जिनकी 75 प्रतिशत से अधिक जमीन का अधिग्रहण किया जाएगा ऐसे परिवारों में से एक व्यक्ति को रेलवे में स्थाई नौकरी की दी जाएगी। इसके तहत करीब 700 लोगों को अभी तक नौकरी दी गई है। इस परियोजना के निर्माण के साथ ही रेलवे ने जम्मू—कश्मीर के विभिन्न इलाकों में 235 किमी की सड़क का निर्माण किया है। यह सड़क राज्य के दूर—दराज इलाकों तक लोगों की पहुंच सुनिश्चित करेगी। इसके अलावा इस रेलवे लाइन के पूरी तरह बन जाने के बाद राज्य में सभी मौसम में रेल के माध्यम से पहुंच भी सुनिश्चित होगी। राज्य में सवारी और माल ढुलाई का स्थाई माध्‍यम हो जाएगा। इससे राज्‍य में विकास को भी गति मिलेगी। जम्मू से 50 किलोमीटर दूर शिवालिक रेंज की पहाड़ी पर मौजूद माता वैष्‍णव देवी मंदिर में हर साल लाखों भक्‍त दर्शन के लिए आते हैं। 04 जुलाई को जम्‍मू से कटरा के बीच रेल सेवा बहाल हो जाएगी। यानी देश के अलग-अलग इलाकों से आने वाले भक्‍तों को जम्मू में उतरने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अब मंदिर तक जाने के लिए वो सीधे बेस कैंप कटरा तक पहुंच सकेंगे। इस ऐलान का लोगों ने दिल खोलकर स्‍वागत किया है। माता वैष्‍णव देवी का मंदिर, बेस कैंप कटरा से 13 किलोमीटर दूर है। कटरा से लोग पैदल या पिट्ठू के सहारे मंदिर तक पहुंचते हैं। अभी तक कटरा पहुंचने के लिए सड़क ही एक मात्र रास्‍ता था। मौसम खराब होने की वजह लोगों की यात्रा अधूरी रह जाती थी। चट्टान गिरने की वजह से भी रास्‍ते बंद हो जाते थे। लेकिन अब इन सब मुश्किलों से जल्‍द ही छुटकारा मिल जाएगा। इस रूट पर 100 किलो‍मीटर प्रति घंटे के रफ्तार से ट्रेनें दौड़ेंगीं। *** *लेखिका स्‍वतंत्र पत्रकार है

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