Thursday, November 14th, 2019
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उद्योग होगें चौपट, थमेगी विकास की गति

  

नई दिल्‍ली । पेयजल संकट से पूरी दुनिया जूझ रही है। भारत में तो कई इलाकों में एक-एक बूंद पानी के लिए खून-खराबें की खबरें भी आम बात हो गईं हैं। कुछ साल पहले फिक्की के सर्वे के अनुसार देश की 60 फीसद कंपनियों का मानना है कि जल संकट ने उनके कारोबार को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है। इस सर्वे को हाल ही में चेन्नई की कंपनियों द्वारा उनके कर्मचारियों को दिए गए दिशानिर्देश से जोड़कर देखने की जरूरत है। कंपनियों की ओर से जारी निर्देश में कहा गया है कि सभी कर्मचारी अपने घर से ही काम करें। 

जल संकट के चलते ऑफिस न आएं। यह बानगी है उस खतरे की जिसने कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है। 1962 में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी चीन की दोगुनी थी और इसकी प्रति व्यक्ति स्वच्छ भूजल की हिस्सेदार चीन की 75 फीसद थी। 2014 में भारत की स्वच्छ भूजल की प्रति व्यक्ति हिस्सेदारी चीन की 54 फीसद रह गई। इस समय तक चीन की प्रति व्यक्ति जीडीपी भारत से तीन गुना हो चुकी थी। पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि आर्थिक तरक्‍की को बनाए रखना है तो हमें भूजल दोहन पर लगाम लगानी होगी। 

 

पिछले साल शिमला की रोजाना जलापूर्ति 4.4 करोड़ लीटर से कम होकर 1.8 करोड़ लीटर जा पहुंची। पानी के अभाव में पर्यटन चौपट हो गया। ऐसे में पानी नहीं होगा तो पर्यटन नहीं होगा, उद्योग अपने कच्चे माल को तैयार नहीं कर पाएंगे। लिहाजा देश की पांच लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का सपना मूर्त रूप नहीं लेगा। कम पानी वाली फसलों और प्रजातियों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की दरकार है। एक किग्रा चावल पैदा करने में 4500 लीटर पानी खर्च होता है जबकि गेहूं के लिए यह आंकड़ा 2000 लीटर है।

 


2016 में विश्व बैंक के एक अध्ययन में चेताया गया है कि अगर भारत जल संसाधनों का कुशलतम इस्तेमाल और उसके उपायों पर ध्यान नहीं देता है तो 2050 तक उसकी जीडीपी विकास दर छह फीसद से भी नीचे रह सकती है। हाल ही में नीति आयोग की रिपोर्ट में बताया गया कि देश के कई औद्योगिक केंद्रों वाले शहर अगले साल तक शून्य भूजल स्तर तक जा सकते हैं। तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे उद्योगों से भरे-पूरे राज्य अपनी शहरी आबादी के 53-72 फीसद हिस्से की ही जलापूर्ति सुनिश्चित करने में सक्षम हैं। एक सार्वभौमिक विलायक, शीतलक और सफाई करने वाले तत्व के रूप में पानी उद्योगों की अनिवार्य जरूरत है। ज्यादातर उद्योगों ने भूजल निकालने के लिए खुद के बोरवेल लगा रखे हैं। अत्यधिक दोहन के चलते कई बार इन उद्योगों को पानी न मिलने के कारण कारोबार ठप भी करना पड़ता है। वल्र्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के अनुसार 2013 से 2016 के बीच 14 से 20 थर्मल पावर प्लांट को पानी की किल्लत के चलते अपना काम बंद करना पड़ा था। उद्योगों को भी पानी इस्तेमाल के विकल्पों को तलाशना होगा, अथवा जितना पानी साल भर इस्तेमाल करते हैं उतनी मात्रा का धरती में पुनर्भरण करना पड़ेगा तभी समस्या से निजात मिल सकती है। PLC.

 


 

 

 

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