उद्भ्रांत के खंडकाव्य ‘वक्रतुण्ड’ पर गोष्ठी आयोजित

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संतोष खरे

सतना (मध्य प्रदेश). मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद् की साहित्य अकादमी द्वारा संचालित ‘पाठक मंच’ की मासिक गोष्ठी श्री उद्भ्रांत के खण्डकाव्य ‘वक्रतुण्ड’ पर आयोजित की गई जिसकी अध्यक्षता सुप्रसिध्द कवि श्री अनूप अशेष ने की तथा वरिष्ठ साहित्यकार विनोद पयासी ने समीक्षा प्रस्तुत की। गोष्ठी का संचालन डॉ. अजय तिवारी ने किया तथा गोष्ठी में सर्वश्री देवीशरण ग्रामीण, डॉ. आत्माराम तिवारी, चिन्तामणि मिश्र, विष्णुस्वरूप श्रीवास्तव, मोहनलाल वर्मा मुकुट, गोरखनाथ अग्रवाल, भरत जैन, मोहन लाल रैकवार, अनिल अयान, ठाकुर खिलवानी एवं संयोजक संतोष खरे उपस्थित रहे।

अपनी समीक्षा में समीक्षक ने मुख्य रूप से यह बताया कि प्रचलित मान्यताओं के आधार पर श्रीगणेश को आदि देव माना जाता है जिसका वर्णन गणेश पुराण, मुद्गल पुराण, पद्म पुराण, मत्स्य पुराण, स्कंद पुराण, शिव पुराण, वामन पुराण में मिलता है। गणेश का पूजन हमारी वर्तमान सभ्यता के प्रारंभ से ही चला आ रहा है और वे सभी वर्गों के स्वीकृत देवता रहे हैं। किसी भी शुभ कार्य के सफलीभूत होने की आकांक्षा के रूपक के रूप में वे सदैव पूजनीय रहे हैं। वे भारत के अलावा मध्य एशिया के लंका, नेपाल, मैक्सिको, अफगानिस्तान, तिब्बत, जापान आदि देशों में प्रतिष्ठित देव रहे हैं। उनकी विविध नामों से पहचान रही है। जैसे गणपति, गजानन, गजमुख, गजनंदन, गौरीसुत, शंकरसुत और वक्रतुण्ड आदि। इस पुस्तक के रचयिता ने प्राचीन किंवदंतियों और विरोधी गाथाओं के बीच से ‘वक्रतुण्ड’ नाम स्वीकार करते हुये वर्तमान परिस्थितियों की प्रासंगिकता को ध्यान में रखते हुए उनकी जीवन गाथा को अपने कथाक्रम का आधार बनाया है। रचना इसलिए भी महत्तवपूर्ण है कि संभवत: हिन्दी साहित्य का यह प्रथम खण्डकाव्य है जो बहुश्रुत देव श्रीगणेश पर लिखा गया है। इसके लिए कवि बधाई का पात्र है। मंगलाचरण की गेयता के बीच सभी सर्ग मुक्त छंद में हैं, जहाँ बुध्दितत्व की प्राथमिकता एवं हृदय पक्ष का गौण होना परिलक्षित होता है।

चर्चा में भाग लेते हुये डॉ. आत्माराम तिवारी ने कहा कि गणेश से इस देश की पहचान है और वे ही सर्वाधिक पूजनीय देवता माने जाते हैं। उन्होंने कहा कि वस्तुत: श्रीगणेश आस्था के देवता हैं और शुरू से ही वे सभी वर्ग और जाति के लोगों के द्वारा पूजे जाते रहे हैं, तथापि देवता कोई भी हो वह मानव-मस्तिष्क की उपज है। उन्होंने यह भी कहा कि यह एक विडम्बना है कि हम देवताओं की केवल पूजा करते हैं, उनके आचरण्ा और कार्यों का अनुकरण नहीं करते। देवीशरण ग्रामीण ने कहा कि साहित्यकार समय-सापेक्ष होता है और इसी आधार पर परंपरा और मूल्यों का विश्लेषण करता है। यही प्रगतिशीलता है। जबकि प्रतिक्रियावादी लोग परंपराओं का विश्लेषण इस तरह से करते हैं कि पाठक अंधविश्वास की दिशा में जाने लगता है। श्रीगणेश जैसे विशाल काया वाले देवता को मूषक की सवारी करते हुए बताना यह प्रकट करता है कि छोटे का सहारा लेना भी महत्तवपूर्ण होता है। लेखक आदर्श की स्थापना करता है और उसकी कल्पना इस तरह की होनी चाहिये कि पाठक की मानसिकता प्रगतिशील सिध्दांतों पर विश्वास कर सके।

चिन्तामणि मिश्र ने कहा कि हमें कथाओं को मिथक के रूप में लेना चाहिये। पुरातन सदैव बुरा नहीं होता। हमें उसमें अच्छाई खोजनी होगी। समय की आवश्यकताओं के अनुसार हिन्दू देवी-देवताओं का प्रादुर्भाव होता रहा है और हमें उनके आदर्शों पर चलना चाहिये। विष्णुस्वरूप श्रीवास्तव ने कहा कि गणेश के मिथक को समझने के लिए ‘वक्रतुण्ड’ एक अच्छा खण्डकाव्य है। हमारे स्वतंत्रता आंदोलन में लोकमान्य तिलक ने गणेश-उत्सव को अंग्रेजों के छद्म को उभारने में ‘वक्रतुण्ड’ का ही सहारा लिया था। उनके माध्यम से तिलक ने महाराष्ट्र के घर-घर में अंग्रेजों के विरोध को जाग्रत किया। शिवाजी ने गणेश के माध्यम से भारतवासियों के गौरव को प्रतिष्ठित किया। जिस प्रकार श्री गणेश ने तारकासुर का वध किया था, उसी प्रकार महाराष्ट्र के दो नौजवानों ने महारानी विक्टोरिया की हीरक जयंती पर कमिश्नर मिस्टर रैण्ड और एक अंग्रेज़ अफ़सर का वध किया था। हमें प्राचीन साहित्य और अपनी सांस्कृतिक विरासत की अनावश्यक आलोचना नहीं करनी चाहिये। जैसा कि रामविलास शर्मा का कथन है कि लेखक वैज्ञानिक आलोचना के नाम पर भारत के प्राचीन साहित्य और सांस्कृतिक विरासत की भौंडी नुक्ताचीनी न करे। वह धार्मिक रूपों के अंदर छिपी हुई ऐतिहासिक वस्तु, जनवादी भाव-विचारों की अवहेलना करके अपनी विरासत को प्रतिक्रियावादियों के हाथ में न सौंप दे। इस दृष्टि से ही कवि और समीक्षक का अस्तित्व सिध्द हो सकेगा।

वरिष्ठ लेखक मोहनलाल वर्मा मुकुट ने कहा कि गणेश अहिंसक देवता हैं, अत: उनका प्रथम पूजन होता है। वे परम शक्तिवान और ज्ञानवान माने जाते हैं। इन्ही कारणों से उनका प्रथम पूजन किया जाता है। उन्होंने कहा की गणपति की केवल पूजा मात्र पर्याप्त नहीं है। हमें उनके गुणों को भी ग्रहण करना चाहिये। गोष्ठी में सर्वश्री मोहनलाल रैकवार, अनिल अयान, भरत जैन, गोरखनाथ अग्रवाल ने भी संक्षेप में विचार व्यक्त किये।

गोष्ठी में अध्यक्ष अनूप अशेष ने कहा कि यह काव्य भी नवीन, प्रेरक और समकालीन जीवन के विरोधाभासों से जूझने का एक नया प्रयोग है। इस काव्य में ‘वक्रतुण्ड’ के शौर्य का वर्णन है और गणपति के जन्म की बहुप्रचलित कथा को आधार बनाकर भगवान शिव और माता पार्वती के आपसी प्रेम तथा अपनी संतान के प्रति वात्सल्य का मोहक चित्रण कवि ने किया है। कवि ने इस प्राचीन मिथक को अपनी कल्पना के सहयोग से समकालीन बना दिया है, जिसके लिए कवि बधाई का पात्र है। आभार व्यक्त करते हुये संयोजक संतोष खरे कहा कि यह पुस्तक ऐसे समय में आई है, जब पूरे देश में गणेशोत्सव मनाया जा रहा है और इस तरह यह पुस्तक सामयिक होने के साथ-साथ हमें श्रीगणेश के जन्म, जीवन और कार्यों का परिचय देती है।

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