Friday, November 15th, 2019
Close X

उदय वीर सिंह की कविताएँ

 
 कविताएँ 
1- धर्म वालों मैं पुछना चाहता हूँ 
किस धर्म का ये गीत है खून खूनी जिंदगी - किस पंथ की ये रीत है कदमों के नीचे वंदगी - करुणा दया के पाँव कटते बेबस बनेगी जिंदगी - किस धर्म की ये जीत है रोएगी दर दर जिंदगी - किस धर्म की ये प्रीत है लाशों पे जीती जिंदगी - किस धर्म की ये सीख है जीवन को जारे जिंदगी -
2-
रोकर किसी से आप मोहब्बत न मांगिए अपने या अपने गैर को गुरबत न मगिए - काफी नहीं है जिंदगी जितनी मिली हमें उलफत के रास्तों से रुखसत न मांगिए - अफसानों ने है लिखा हम शहादतपसंद है गद्दारों की जिंदगी और सोहबत न मांगिए - आसमां कह रहा है ये जमी कह रही है ना मांगो अगर दुआ तो नफरत न मांगिए - न रोक पाई है हौसलों को दरिया कभी कोई कागज के नाव सी कभी किस्मत न मांगिए
3-
जब आँखों में नेह नहीं नीर न जाने बहते क्यों ? नेह नयन में आया जब नीर न जाने बहते क्यों ? सूनी आँखों के मरुधर प्रेम के बदल ढूंढ रहे जलते पांव वेदन बढती है नीर न जाने बहते क्यों ? रूठा मीत परदेस बसा न मना सके कर जोड़ उसे ह्रदय मुकुर मन टूट गया नीर न जाने बहते क्यों ?
4- लफ़्फ़बाजों को सियासत में उतार दिया है देख बाबाओं को धर्म ने बाजार दिया है - अब ऊँची ऊँची धर्म की दीवारें खींचीं हैं जातियों की गहरी खायीं ने आकार लिया है - धर्म जाति को बचा ने की सियासत होती है इंसानियत को कहीं आदमी ने मार दिया है- विपन्नता बनी रहे इंतजाम है महंगाई का प्रेम व विस्वास का क्या पुरस्कार दिया है- उजारे की आश उनका घर अँधेरा रह गया खाली जनधनी किताब हाथ आधार लिया है-
___________________
Uday Veer Singh poet, poet Uday Veer Singh, writer Uday Veer Singh, Uday Veer Singh, author, writer Uday Veer Singh, Uday Veer Singh writer, thinker Uday Veer Singh,परिचय
उदय वीर सिंह
कवि व् लेखक 
शिक्षा - गोरखपुर विश्वविद्यालय से
स्वतंत्र  लेखन
गोरखपुर में रहते हैं

Comments

CAPTCHA code

Users Comment