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Wednesday, June 16th, 2021

उत्तर प्रदेश के सिने गीतकार पुस्तक का प्रकाशन

आई एन वी सी न्यूज़
लखनऊ,  
साहित्यिक गीतों का फिल्म के गीतों से कोई सम्बन्ध नहीं होता, क्योंकि फिल्मी गीत कहानी सिचुअशन के मुताबिक लिखे जाते हैं और साहित्यिक गीत रचनाधर्म को निभाने के लिए। यह बात जानकर भी सिनेमा के आरम्भ काल में ही पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने सन 1946 में लाहौर में और उसके बाद बम्बई (वर्तमान मुम्बई) में फिल्म-क्षेत्र में कार्य किया। पे्रमचन्द्र,गोपाल सिंह नेपाली, सुमित्रनंदन पंत ,अमृतलाल नागर, हरिकृष्ण प्रेमी,भगवती चरण वर्मा ,उपेंद्र नाथ अश्क, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, रेणु ,राजेंद्र सिंह बेदी, राजेंद्र यादव,कमलेश्वर,राहीमासूम रजा, मन्नू भंडारी तक अनेक कवि,साहित्यकार सिनेमा में आये कुछ सफल भी हुये और कुछ हमेशा के लिए सिनेमा से जल्द ही उनका मोहभंग हुआ और वे वापस साहित्य की दुनिया में लौट आए। प्रेमचंद के सिनेमा से मोहभंग को रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपने संस्मरण में लिखा है- ‘1934 की बात है। बंबई में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था। इन पंक्तियों का लेखक कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल होने आया। बंबई में हर जगह पोस्टर चिपके हुए थे कि प्रेमचंद जी का ‘मजदूर’ अमुक तारीख से रजतपट पर आ रहा है। ललक हुई, अवश्य देखूं कि अचानक प्रेमचंद जी से भेंट हुई । मैंने ‘मजदूर’ की चर्चा कर दी। बोले ‘यदि तुम मेरी इज्जत करते हो तो ये फिल्म कभी नहीं देखना।’ यह कहते हुए उनकी आंखें नम हो गईं। और, तब से इस कूचे में आने वाले जिन हिंदी लेखकों से भेंट हुई सबने प्रेमचंद जी के अनुभवों को ही दोहराया है ।’ लेकिन सिनेमा का आकर्षण कभी कम तो कभी अधिक बना रहा। वर्ष 1931 में सिनेमा जगत में अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ जब फिल्मों को जुबान मिल गयी जिसमें संवादों के साथ-साथ फिल्में चलती फिरती होने लगीं साथ ही उनमें गीत, संगीत भी सम्मिलित हो गया फलस्वरूप फिल्मों के माध्यम से होने वाले मनोरंजन का स्तर काफी बढ़ गया। चलती फिरती फिल्मों में प्रारंभ में तो वही गीत सम्मिलित किये गये थे वास्तव में वह गीत पूर्व में लिखे जा चुके थे अतः उन गीतकारों को फिल्मी गीतकार की संज्ञा देना किसी हद तक ठीक होगा। किन्तु धीरे धीरे फिल्मों के दृश्यों की सिचियूशन के अनुसार गीतों की मांग होने लगी और फिल्मों की सिचियूशन के अनुसार जिन गीतकारों ने गीत लिखकर फिल्मों को दिये वह वास्तविक फिल्मी गीतकार कहलाये जाने लगे। भारत के अनेक प्रदेशों में तमाम गीतकार फिल्मी दुनिया से जुड़ गये और उन्होंने अपने प्रदेशों की रीजिनल फिल्मों में वहाॅ की फिल्मों की भाषा के अनुसार गीतों को लिखना प्रारंभ किया। ऐसे में उ0प्र0 के अनेक गीतकारों ने हिन्दी फिल्मों में अपने गीत लिखकर वालीवुड में अपना योगदान तो किया ही साथ ही हिन्दी फिल्मी गीतकारों के रूप में अपना सर्वोच्च स्थान बना लिया।पण्डित नरेन्द्र शर्मा का दिल छू लेने वाला गीत ‘‘ज्योति कलश छलके’’। गोपाल दास नीरज द्वारा लिखा गया गीत ‘‘जीवन की बगिया महकेगी’’। नूर लखनवी (बाबू कुंजबिहारी लाल श्रीवास्तव)- का गीत ‘‘अमवा की डारी डारी बोले रे कोयलिया’’।योगेश लिखे गये गीत ‘‘कहीं दूर जब दिन ढल जाये’’ तथा ‘‘जिन्दगी कैसी है पहेली’’ हैं। अनजान का लिखा गीत - छूकर मेरे मन को किया तून क्या इशारा आदि अनेक फिल्मी गीत जन जन के बीच अपनी प्रसिद्धि प्राप्त करने में सफल हुये लेकिन साहित्य की दुनियां में न तो कभी फिल्मी गीतकार,कहानीकार और संवाद लेखक को महत्व दिया।जब फेस बुक ओर सोशल मीडिया के दोर में आन लाइन संगोष्ठी के प्रमोशन की प्रतिस्पर्धा चल रही हो जिसकी सार्थकता पर शोध चल रहा हो उस वक्त में सिनेमा में योगदान करने बाले फिल्मी गीतकार,कहानीकार और संवाद लेखक पर चर्चा तो होनी ही चाहिए।देवमणि पान्डेय से लेकर मनोज मुंतजिर तक एक लम्बा सिलसिला है। फिल्मी गीतकारों के जीवन परिचय के साथ  उत्तर प्रदेश के सिने गीतकार पुस्तक का प्रकाशन कर रही है।सभी रचनाकारों तथा पाठकों से निवेदन है कि आप अपनेे क्षेत्र के निवासी सिने गीतकार का नाम ओर जीवन परिचय तथा संपर्क भेजे ताकि कोई भी सिने गीतकार छूट न जाये। जानकारी ltp284403@gmail.com पर मेल द्वारा अथवा 9415508695 पर व्हाटशेप पर भेजे

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