Tuesday, February 25th, 2020

इफ्तार पार्टियां पर कुठाराघत क्यों

- संजय रोकड़े -

वैसे तो भारत में मुस्लिम और दलितों को लेकर हमेशा से मुख्यधारा के लोगों का सिलेक्टिव नजरियां रहा है, लेकिन बीते तीन-चार सालों में कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। इनके आचार-विचार, रहन-सहन, खान-पान, धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों को लेकर तरह- तरह से बेवजह सवाल खड़े किए जा रहे है। हाल ही में खबरें आई कि राष्ट्रपति भवन में सालों से चली आ रही रोजा इफ्तार पर पाबंदी लगा दी है। परंपरागत होने वाली इफ्तार पार्टी पर अब माननीय राष्ट्रपति ने रोक लगा दी है। हालाकि उनके इस फैसले पर कई लोगों ने सवाल खड़े किए। इस फैसले को भाजपा की हिंदू तुष्टीकरण के नजरिए से भी देखा जा रहा है। बहरहाल, राष्ट्रपति इफ्तार पार्टी दे या न दे ये उनका विशेषाधिकार है। वह सांस्कृतिक परंपराओं को तौड़े या निभाएं इससे भी कोई फरक नही पड़ता है लेकिन उनकी इस इफ्तार पार्टी के नही दिए जाने के बाद से जो बेवजह की बातें होने लगी है ये सबसे खतरनाक है। सवाल ये किया जा रहा है कि क्या इफ्तार पार्टियां तुष्टिकरण की राजनीति नहीं हैं? बहरहाल मान भी लिया जाए कि ये इफ्तार पार्टियां राजनीति तुष्टिकरण के लिए ही आयोजित की जाती है तो क्या इनका आयोजन बंद हो जाना चाहिए। दरअसल हम इस्लाम के धार्मिक- सांस्कृतिक रीति-रिवाजों को लेकर कुछ ज्यादा ही सिलेक्टिव होते जा रहे है। सवाल तो ये भी मौजूं है कि क्या वाकई इफ्तार पार्टियां राजनीति तुष्टिकरण के लिए ही आयोजित की जाती है या यह किसी धर्म विशेष के लोगों की आस्था का केन्द्र है। गर ये तुष्टिकरण है तो फिर दीवाली- होली मिलन समारोह क्या है। क्या इस तरह के मिलन समारोह भी राजनीतिक तुष्टीकरण नही है।

किसी धर्म विशेष के आयोजन को राजनीतिक तुष्टीकरण करार देना हमारी सोच पर ही प्रश्र चिन्ह लगाती है। इसमें कोई दो राय नही है कि किसी भी धर्म और समाज में होने वाले धार्मिक व सांस्कृतिक आयोजनों में वक्त के साथ अनेक बदलाव हुए है। ये पारंपरिक रिवाजों से हटे भी है, उनमें कुछ विसंगतियां भी आई है लेकिन इन विसंगतियों के कारण उनको बंद कर देने या उन पर आक्षेप लगाने की प्रवृत्ति कितनी उचित है। किसी भी धर्म के समारोह राजनीतिक हित के साधक होते है। राजनीतिक दल और उनक राजनेता इनके सहारे अपना हित साधने से चुकते नही है। लेकिन सवाल तो यह है कि क्या सियासत के जायज-नाजायज कृत्यों के चलते पारंपरिक उत्सवों को बंद करने की बात करना या उनको अनुचित करार देना कितना लाजिमी है। सभी धर्मों की अपनी रस्में होती है उनका सरोकर उस धर्म के जनमानस से सीधे होता है।

ऐसे में जनमानस की आस्था पर कुठाराघात करना कितना सही है। इस समय इफ्तार पार्टियों को लेकर जो नाजायज चर्चाएं हो खड़ी की जा रही है उनके होने पर सवाल दागे जा रहे ये बेहद खतरनाक है। इसके पहले हमें इनके धार्मिक महत्व को समझना होगा। काबिलेगौर हो कि रमजान का माह खत्म होते ही ईद के साथ-साथ इफ्तार पार्टियों का दौर शुरू हो जाता है। सूर्यास्त पर व्यक्ति जब अपना रोजा खोलता है उसे अरबी भाषा में इफ्तार कहा जाता है। इस्लाम में इफ्तार का बहुत अहम स्थान है। पूरे दिन रोजा रखने के बाद शाम को सूर्य अस्त पर जब रोजेदार खाने या पानी का सेवन करता है, तब उसे एहसास होता है कि भोजन खुदा की कितनी नेक इनायत है। इसके बाद ही इस बात का एहसास होता है कि इंसान खुदा की मदद के बिना कुछ नहीं है। इसी भाव से रोजेदार को रोजा भी खोलना होता है। जब इंसान रोजा खोलने बैठता है तब कि यह मान्यता भी है कि ईश्वर उसके सबसे निकट होता है। उस समय वह जो प्रार्थना करता है उसे ईश्वर सुनता है दूसरे शब्दों में कहें तो वह आत्ममंथन का समय होता है। उसे ईश्वर ने दुनिया में क्यों भेजा है, कैसे संसार में एक संयमित जीवन जीना है। इन्हीं भावों के साथ उसे आगे के ग्यारह महीने काटने होते हैं। हजरत मुहम्मद

साहब अपना रोजा खजूर खा कर खोलते थे, उनका जीवन इतना सादा था कि कई बार सिर्फ खजूर और पानी ही नसीब होता था। बेशक उनके साथ ऐसा समय रहा होगा लेकिन इस दौर में रोजा इफ्तार पार्टियां सत्ता साधन का भी माध्यम बन गयी है। जिस तरह से भारतीय राजनीति में विकृतियां है ठीक उसी तरह से उनके द्वारा आयोजित आयोजनों में भी देखने को मिलेगी। अब ये रोजा इफ्तार पार्टियों में भी देखी जा सकती है। अब तो राजनीतिक पार्टियों में स्पर्धा सी होने लगी है। किस राजनीतिक दल के इफ्तार पार्टी की ज्यादा चर्चा हो रही है। इनमें मुस्लिम समाज का नेत्तृत्व करने वाले और प्रभाव रखने वाले अनेक सामाजिक नेता देखने को मिल जाएगें। ऐसे माहौल का लाभ उठाने में राजनीतिक दल जरा भी चुकते नही है। मतलब साफ है कि इफ्तार की राजनीति जोर पकड़ती दिख रही है। बीते दिनों दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इफ्तार पार्टी रखी तो भाजपा के नेता मुख्तार अब्बास नकवी भी कहां पीछे रहने वाले थे, उनने भी 'तीन तलाक से पीडि़त महिलाओंÓ के लिए इफ्तार पार्टी का आयोजन कर यह साबित कर दिया कि तुष्टिकरण में हम भी किसी से कहीं पीछे नही है। बहरहाल, इन दोनों पार्टियों की राजनीतिक गलियारों में खासी चर्चा है।

वैसे तो इफ्तार पार्टियों के जरिए राजनीतिक संदेश देने की परिपाटी देश में नई नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में इस ट्रेंड में थोड़ा बदलाव दिखने लगा है। कथित हिंदुत्ववादी राजनीति वाले इस दौर में इफ्तार को लेकर सरकारी दायरे में अतिरिक्त सतर्कता दिखनी लाजिमी है, लेकिन विपक्षी कांग्रेस भी इसे लेकर असहज महसूस करने लगी थी। पहले हम कांग्रेस के संदर्भ में बात करते है। ये सर्र्व विदित है कि कांग्रेस पर मुस्लिम समर्थक पार्टी होने के आरोप लगते रहे है। इसके चलते उसे लाभ हुआ है तो हानि भी हुई है। कुछ समय पहले खुद सोनिया गांधी ने आक्रोशित होकर कहा था कि 'हमारी पार्टी के बारे में यह दुष्प्रचार किया जाता है कि यह मुस्लिमों की पार्टी है।Ó ऐसे माहौल में कांग्रेस का इफ्तार पार्टी आयोजित करने में दिलचस्पी न लेना स्वाभाविक था। 2016 में बाकायदा घोषणा की गई कि इस बार कांग्रेस अध्यक्ष की ओर से इफ्तार पार्टी नहीं दी जाएगी।

मगर दो वर्षों के अंतराल के बाद आम चुनाव से जुड़ी चर्चाओं के बीच नए पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने भव्य इफ्तार पार्टी आयोजित करने का फैसला किया। हालाकि फिर उसी राह पर जाने के पहले पार्टी के भीतर विचार-विमर्श तो हुआ ही होगा। ये इफ्तार पार्टी इस कयासबाजी को लेकर भी खासी चर्चा में रही। इसमें समाजवादी पार्टी और बीएसपी के बड़े नेताओं की गैरमौजूदगी पर भी खूब बातें हुईं। चुनावी साल में किसी भी राजनीतिक दल की ओर से किया गया कोई भी बड़ा आयोजन ऐसे सवालों से बच नहीं सकता। बेशक, राजनीतिक इफ्तार पार्टियों की अपनी अहमियत है लेकिन इनका मकसद विपक्ष से ज्यादा जनता में संदेश भेजने का होता है। अब बात भाजपा कि- भाजपा भले ही हिंदूओं का भावनात्मक शोषण कर मस्लिम विरोध की राजनीति पर ठीकी हो लेकिन जब भी उसे इस्लाम के मानने वाले लोगों को साधना होता है तब वह चुकती नही है। आज भी भारत में करीब 18 फीसदी मुस्लिम आबादी बसती है। इतनी बड़ी आबादी को नजर अंदाज कर कोई भी राजनीतिक दल भारत में बहुमत के साथ राज नही कर सकता है। मुख्तार अब्बास नकवी द्वारा 'तीन तलाक से पीडि़त महिलाओंÓ के लिए इफ्तार पार्टी का आयोजन करना भी इसी का एक हिस्सा है।

बहरहाल कांग्रेस ने बहुत जल्दी यह समझ लिया कि किसी धर्म विशेष का ठप्पा लगने के चलते पार्टी को उस समाज के आयोजनों पर प्रतिबंध नही लगाना चाहिए। शायद इसी कारण अबकि राहुल ने इफ्तार पार्टी रखकर संदेश देना चाहा कि हम आपके साथ है। लेकिन भाजपा का समझ में नही आ रहा है। वह एक तरफ तो इस तरह के आयोजन करके मुस्लिम समाज को संदेश देना चाहती है कि कांग्रेस ही उसकी हितैषी नही है, वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रपति भवन में होने वाले इस गरिमामय आयोजन को रद्द करके हिंदूओं को कुछ और जताना चाहती है। यह दोगलापन क्या हिंदूओं या मुस्लिमों का मन जीत पाएगा। राष्ट्रपति भवन में इफ्तार पार्टी न करके इस पर कुठाराघत करना कितना उचित है

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परिचय – :
संजय रोकड़े
पत्रकार ,लेखक व् सामाजिक चिन्तक
संपर्क – : 09827277518 , 103, देवेन्द्र नगर अन्नपुर्णा रोड़ इंदौर
लेखक पत्रकारिता जगत से सरोकार रखने वाली पत्रिका मीडिय़ा रिलेशन का संपादन करते है और सम-सामयिक मुद्दों पर कलम भी चलाते है।
Disclaimer : The views expressed by the author in this feature are entirely his  own and do not necessarily reflect the views of INVC NEWS.


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