Friday, April 3rd, 2020

इंसानी नस्लों के लिए खतरा नस्लवाद, एक बार हम फिर चुप

ज़ाकिर हुसैन पैदा हुआ हव्वा की कोख से मगर, न जाने कब किसने हैवाँ बना दिया न बनने दिया इन्सां मगर, न जाने कब किसने हिन्दू-मुसलमां बना दिया नस्लवाद वो हथियार है जो इंसान की नस्लों को बर्बाद करने के लिए इंसान ने ही बनाया है। यह वो हथियार है जिसका सहारा लेकर एक समुदाय के लोगों ने या यूं कहें एक रंग के लोगों ने दूसरे समुदाय या दूसरे रंग के लोगों के खिलाफ अपने समुदाय का जहन परिवर्तन करके एक समुदाय को दूसरे समुदाय का कत्ल करने के लिए आमने-सामने ला खड़ा किया। अगर थोड़ा-सा पीछे जाएं तो दक्षिणी अफ्रीका को नस्लवाल की वजह से दुनियाभर की पाबंदी के साथ-साथ निंदा भी झेलनी पड़ी। हिटलर का नस्लवाद के नाम पर यहूदियों का किया कत्लेआम इंसानी इतिहास पर एक काला धब्बा है। यह एक ऐसा काला धब्बा है जब तक इंसानी बस्ती इस धरती पर बसी रहेंगी तब तक नस्लवाद के नाम पर किए गए कत्लेआम को एक कभी न भूलने वाले बुरे अहसास के तौर पर इंसानी नस्ल याद रखेगी। वक्त बदला, पर नहीं बदला नस्लवाद के नाम पर इंसानी बस्तियों में फर्क का जहर फैलाने वाले इंसानों का जहन और इसी का जीता-जागता उदाहरण है ऑस्ट्रेलिया के अंदर भारतीय छात्रों पर लगातार किए जाने वाले जानलेवा हमले। गौरतलब है कि पिछले सप्ताह श्रवण कुमार के पेट में स्क्रू ड्राइवर से वार कर उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया गया। इसके बाद छात्र राजेश कुमार पर पेट्रोल बम से हमला किया गया। पिछले महीने ही जालंधर के युवक उपकार सिंह की संदिध हालत में मौत हो गई थी। भारतीयों छात्रों पर बर्बर हमलों में तेजी के बाद भारतीय छात्र विरोध स्वरूप सड़कों पर उतर आए। फेडरेशन इंडियन स्टूडेंट्स इन ऑस्टे्रलिया एफआईएसए और नेशनल यूनियन ऑफ स्टूडैंट्स के आह्वान पर भारतीय छात्रों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। प्रदर्शन के दौरान जहां छात्र दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे थे, वहीं वे भारत माता की जय के नारे भी लगा रहे थे। ऑस्टे्रलिया पुलिस ने प्रदर्शनकारी छात्रों पर लाठीचार्ज किया और करीब 14 छात्रों को हिरासत में ले लिया। इसके बाद छात्रों ने अपना प्रदर्शन बंद कर दिया है।   भारतीय छात्रों की मुख्य मांगों में दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करना, भारतीय छात्रों को सुरक्षा मुहैया कराना, विक्टोरिया के लिए एक बहुसांस्कृतिक पुलिस बल का गठन करना, नस्लीय आधार पर भेदभाव खत्म करने के लिए जागरूकता अभियान चलाना, अपराध के आंकड़ें सार्वजनिक करना और विदेशी छात्रों के अर्थव्यवस्था में योगदान को रेखांकित करते हुए विज्ञापन अभियान चलाना शामिल है। गौरतलब है कि ऑस्ट्रेलिया में करीब 95 हजार छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था में भारतीय छात्रों की फीस आदि से मिलने वाले राजस्व का महत्वर्पूण योगदान है। पिछले साल ऑस्ट्रेलिया सरकार को भारतीय छात्रों से फीस राजस्व के रूप में 90 करोड़ रुपए प्राप्त हुए थे। गौर करने लायक बात यह भी है कि जहां भारत में ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हमलों की कड़े शब्दों में निंदा की जा रही है, वहीं ऑस्टे्रलिया के लोग भारतीय छात्रों पर ही निशाना साध रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी ऑस्ट्रेलया में भारतीय छात्रों पर लगातार हो रहे हमलों की निंदा करते हुए कहा है कि वहां की सरकार को भारतीय छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि नस्लवाद मानवता पर धब्बा है। फिल्मकार आमिर खान ने भी ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हो रहे हमलों की निंदा करते हुए इसे इंसानियत के खिलाफ बताया है तो अमिताभ बच्चन ने भी ऑस्ट्रेलिया से मिलने वाली उपाधि को लेने से इंकार कर दिया है.  सरकारी तंत्र ने भी कुछ ऐसा कह और कर दिया है. अब सवाल यह उठता है कि मात्र इतना करने से या कह देने से यह नस्लवाद का बीज पेड़ बनने से पहले ही मुरझा जाएगा.    आज नस्लवादी ताकतों और देशों के खिलाफ ऐसी सख्त कार्रवाई करने की जरूरत है जैसा किदक्षिणी अफ्रीका के साथ की गई थी। अगर दूसरे देश भारत का सहयोग नहीं करते हैं तो भी भारत इसकी पहल तो कर ही सकता है, लेकिन इस मुल्क के सरकार में बैठे लोगों के साथ दिक्कत यह है कि ये लोग सिर्फ कोरी भाषणबाजी तो कर सकते हैं, पर कोई सख्त कदम नहीं उठा सकते और इसी का खामियाजा पूरा मुल्क भुगत रहा है।

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