Saturday, February 29th, 2020

इंटरनेट मौलिक अधिकार, पाबंदियों की 7 दिन में हो समीक्षा

जम्मू-कश्मीर में संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान खत्म करने के सरकार के निर्णय के बाद इस पूर्व राज्य में लगाये गये प्रतिबंधों के खिलाफ कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद और अन्य की याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को फैसला सुना रहा है। फैसला देते वक्त सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इंटरनेट का अधिकार, अभिव्यक्ति के अधिकार के तहत आता है और यह भी मूलभूत अधिकार हैं। बता दें कि न्यायमूर्ति एन वी रमण, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति बी आर गवई की तीन सदस्यीय पीठ ने इन प्रतिबंधों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर पिछले साल 27 नवंबर को सुनवाई पूरी की थी।

-सुप्रीम कोर्ट ने उन सभी आदेशों को सार्वजनिक करने का आदेश दिया है, जिनके तहत धारा 144 लगाई गई थी।

-उच्च्तम न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन से अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों जैसी आवश्यक सेवाएं प्रदान करने वाली सभी संस्थाओं में इंटरनेट सेवाओं को बहाल करने के लिए कहा।

- सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट के निलंबन की समीक्षा तुरंत करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि इस तरह का इंटरनेट सस्पेंशन सीमित समय अवधि के लिए किया जा सकता है। इंटरनेट बंद करना न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है।  

- सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर सरकार को एक सप्ताह के भीतर सभी प्रतिबंधित आदेशों की समीक्षा करने का निर्देश दिया।

-सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर सरकार को एक सप्ताह के भीतर सभी प्रतिबंधित आदेशों की समीक्षा करने का निर्देश दिया।
-सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट का अधिकार भी अभिव्यक्ति के अधिकार के तहत आता है।
-पाबंदियों के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि लोकतांत्रिक ढांचे में बोलने की आजादी अहम टूल है। आर्टिकल 19 (1) के तहत इंटरनेट की आजादी भी मूलभूत अधिकार है।
-आर्टिकल 370 हटाने के बाद जम्मू-कश्मीर में पाबंदियों को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुनाते वक्त सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कश्मीर ने काफी हिंसा देखी है। हम सुरक्षा मुद्दों के साथ मानवाधिकारों और आजादी को को संतुलित करने के लिए पूरी कोशिश करेंगे।
-सुप्रीम कोर्ट ने फैसला पढ़ना शुरू किया।

केन्द्र सरकार ने जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान समाप्त करने के बाद वहां लगाये गये प्रतिबंधों को 21 नवंबर को सही ठहराया था। केन्द्र ने न्यायालय में कहा था कि सरकार के एहतियाती उपायों की वजह से ही राज्य में किसी व्यक्ति की न तो जान गई और न ही एक भी गोली चलानी पड़ी।

गुलाम नबी आजाद के अलावा, कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन और कई अन्य ने घाटी में संचार व्यवस्था ठप होने सहित अनेक प्रतिबंधों को चुनौती देते हुये याचिकाएं दायर की थीं।

केन्द्र ने कश्मीर घाटी में आतंकी हिंसा का हवाला देते हुये कहा था कि कई सालों से सीमा पार से आतंकवादियों को यहां भेजा जाता था, स्थानीय उग्रवादी और अलगावादी संगठनों ने पूरे क्षेत्र को बंधक बना रखा था और ऐसी स्थिति में अगर सरकार नागरिकों की सुरक्षा के लिये एहतियाती कदम नहीं उठाती तो यह 'मूर्खता' होती।

दरअसल, केन्द्र की मोदी सरकार ने पिछले साल पांच अगस्त को जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के अनेक प्रावधान खत्म कर दिये थे। इसके बाद जम्मू-कश्मीर दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभक्त हो गया था- लद्दाख और कश्मीर।

 

पाबंदी के फैसले सार्वजनिक करे सरकार, इंटरनेट पर पाबंदी नहीं लगा सकते

नई दिल्ली,जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट और अन्य पाबंदियों पर सुप्रीम कोर्ट ने आज अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने साफ कहा कि इंटरनेट को सरकार ऐसे अनिश्चितकाल के लिए बंद नहीं कर सकती। इसके साथ ही प्रशासन से पाबंदी लगानेवाले सभी आदेशों को एक हफ्ते के अंदर रिव्यू करने को कहा गया है। कोर्ट ने इंटरनेट के इस्तेमाल को अभिव्यक्ति के अधिकार का हिस्सा माना है।

सर्वोच्च अदालत की तीन जजों की बेंच ने यह फैसला दिया है। जस्टिस एनवी रमणा की अध्यक्षता वाली बेंच में जस्टिस आर सुभाष रेड्डी और जस्टिस बीआर गवई ने यह महत्वपूर्ण फैसला दिया। कश्मीर में जारी पाबंदियों के खिलाफ कई जनहित याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थीं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की 10 बड़ी बातें
1-लोगों को असहमति जताने का पूरा अधिकार है
2-सरकार अपने सभी आदेशों की 1 हफ्ते में समीक्षा करे
3-सरकार कश्मीर में अपने गैरजरूरी आदेश वापस ले
4-बैन से सभी जुड़े आदेशों को सरकार सार्वजनिक करे
5-आदेशों की बीच-बीच में समीक्षा की जानी चाहिए
6-बिना वजह इंटरनेट पर बैन नहीं लगाया जा सकता
7-इंटरनेट बैन पर सरकार को विचार करना चाहिए
8-इंटरनेट पर पूरा बैन सख्त कदम, जरूरी होने पर लगे
9-सभी जरूरी सेवाओं में इंटरनेट को बहाल किया जाए
10-चिकित्सा जैसी सभी जरूरी सेवाओं में कोई बाधा न आए

सुनवाई में कोर्ट ने क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कश्मीर में हिंसा का लंबा इतिहास रहा है। हमें स्वतंत्रता और सुरक्षा में संतुलन बनाए रखना होगा। नागरिकों के अधिकारों की रक्षा भी जरूरी है। इंटरनेट को जरूरत पड़ने पर ही बंद किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का अंग है। इंटरनेट इस्तेमाल की स्वतंत्रता भी आर्टिकल 19 (1) का हिस्सा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि धारा 144 का इस्तेमाल किसी के विचारों को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता।

इंटरनेट बैन को लेकर संसद में भी हुआ बवाल
5 अगस्त 2019 को आर्टिकल 370 खत्म करने के बाद से पूरे प्रदेश में इंटरनेट सेवाए बंद हैं। ब्रॉडबैंड के जरिए ही घाटी के लोगों का इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन हो पा रहा है। सरकार ने लैंडलाइन फोन और पोस्टपेड मोबाइल पर लगी पाबंदियों को कुछ दिन के बाद बहाल कर दिया गया था। जम्मू कश्मीर में इंटरनेट पर जारी पाबंदियों को लेकर संसद के दोनों सदनों में भी शीतकालीन सत्र में काफी हंगामा हुआ था।

सरकार का तर्क, सुरक्षा कारणों से पाबंदी
जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट बैन पर गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में कहा था कि सुरक्षा कारणों से यह पाबंदी लगाई गई है। शाह ने कहा था कि जैसे ही हालात सामान्य होंगे सभी तरह की पाबंदियां हटा दी जाएंगी। उन्होंने कहा था कि सरकार भी चाहती है कि प्रदेश में जल्द से जल्द इंटरनेट सेवा लागू हो। जनहित याचिकाओं मे कहा गया था कि प्रदेश में इंटरनेट सेवा नहीं होने से आम जनता तक सूचनाओं का प्रसार नहीं हो पा रहा है। PLC.

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