Saturday, April 4th, 2020

नेता लगा रहे डेरे के फेरे


हरियाणा की सत्ता की चाबी जनता के साथ ही डेरों के हाथ भी रही है। जिस तरफ डेरा सच्चा सौदा, प्रदेश में उसी की सरकार, ऐसा पहले होता आया है। 2014 में भाजपा ने मोदी लहर के साथ ही सिरसा डेरा के दम पर प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता पलटी थी। भाजपा 2014 में पहली बार 47 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में भी कामयाब रही। डेरा ने बीते विधानसभा चुनाव में अंतिम समय में भाजपा को अपना समर्थन दिया था। जिससे कांग्रेस और इनेलो की चुनावी रणनीति धरी की धरी रह गई थी।
इस बार भी विधानसभा चुनाव धीरे-धीरे मतदान की ओर बढ़ने लगा है। जिसे देखते हुए सिरसा डेरे पर भी सबकी नजरें टिकी हुई हैं। डेरा प्रमुख गुरमीत सिंह के साध्वी यौन शोषण मामले में जेल जाने के बाद भी अनुयायियों और समर्थकों का आकर्षण डेरे के प्रति कम नहीं हुआ है। सिरसा डेरा में अब भी पहले की तरह धार्मिक आयोजन चल रहे हैं, जिनमें अनुयायी पहुंचते हैं। चुनावी बेला है तो नेता भी पीछे क्यों रहेंगे। राजनीतिक दलों के उम्मीदवार इन दिनों जीत का आशीर्वाद पाने सिरसा डेरा पहुंच रहे हैं।

धार्मिक आयोजनों के दौरान प्रत्याशियों का आना ज्यादा हो रहा है। प्रत्याशी अपनी जीत के लिए जहां डेरा अनुयायियों का समर्थन मांग रहे हैं, वहीं खुद को डेरा का हिमायती भी करार दे रहे हैं। हालांकि, राजनीतिक दलों ने अपने स्तर पर अभी सीधे डेरा की राजनीतिक विंग के साथ चुनाव में समर्थन करने के लिए संपर्क नहीं साधा है। डेरा के राजनीतिक विंग के एक सदस्य ने बताया कि चुनाव में किसी भी दल का समर्थन करने का फैसला अभी तक नहीं लिया गया है। अगर विंग किसी दल का खुला समर्थन करेगा तो बकायदा उसकी सूचना दी जाएगी। किसी पार्टी ने उनसे समर्थन की अपील नहीं की है। प्रत्याशी अपने आप तो डेरे में पहुंच रहे हैं।

राजनीतिक विंग का संदेश, इक्ट्ठे रहना है
विधानसभा चुनाव में किसी राजनीतिक दल को समर्थन देने के लिए सिरसा डेरा की राजनीतिक विंग ने अभी तक कोई फैसला नहीं किया है। हालांकि, विंग में चुनाव को लेकर मंथन जारी है। विंग ने डेरा अनुयायियों को यही संदेश दिया है कि इक्ट्ठे रहना है। यानि चुनाव में डेरा जिस तरफ भी जाने का फैसला लेगा, अनुयायी एकजुट होकर उसी तरफ वोट करेंगे।

स्वच्छता अभियान व गंगा सफाई से प्रभावित होकर दिया था समर्थन
बीते विधानसभा चुनाव में डेरा सच्चा सौदा ने पहली बार भाजपा को समर्थन मोदी सरकार के स्वच्छता अभियान और गंगा सफाई योजना शुरू करने पर दिया था। उस समय डेरा के राजनीतिक विंग ने कहा था कि मोदी सरकार ने अपने शुरूआती कार्यकाल में ही ऐसे अभियान चलाकर परोपकार की भावना दिखाई है।

विभिन्न इलाकों में अनुयायियों के साथ विचार-विमर्श करने के बाद भाजपा को समर्थन देने का फैसला किया गया। विंग ने डेरा के समर्थन के बदौलत हरियाणा की सत्ता पर भाजपा के काबिज होने का दावा किया था। इससे पहले कई चुनाव में डेरा कांग्रेस का साथ देता रहा। डेरा का राजनीति से कोई लेना देना नहीं, जो भी पार्टी अच्छा काम करती है और परोपकार की भावना रखती है, उसे डेरा का साथ मिलता रहा है।
40 उम्मीदवारों के साथ डेरा पहुंचे थे विजयवर्गीय
बीते चुनाव में सिरसा पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनावी कमान थामे डा. कैलाश विजयवर्गीय ने डेरा की राजनीतिक विंग के सदस्यों से बुके भी दिलवाए थे। वियजवर्गीय ने डेरा प्रमुख गुरमीत सिंह से मुलाकात की थी। वह उसके बाद अपने साथ 40 प्रत्याशियों को लेकर भी डेरा पहुंचे थे। इसके बाद पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने डेरा पहुंचकर आशीर्वाद लिया था।

हर जिले में दस से 15 हजार अनुनायी होने का दावा
सिरसा डेरा हर जिले में दस से पंद्रह हजार अनुयायी होने का दावा करता है। वहीं कहा जाता है कि प्रदेश में 15-20 से अधिक सीटों पर डेरा जीत-हार तय करने में सक्षम है। गुरमीत सिंह के डेरा चीफ बनने के बाद ही राजनीतिक गतिविधियों का सिलसिला शुरू हुआ। साल 1998 में डेरा की राजनीतिक विंग बनाई गई।

हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तरप्रदेश व हिमाचल प्रदेश में इस विंग के करीब 35 सदस्य बनाए गए थे। बीते चुनाव में रोचक पहलू यह भी रहा था कि सिरसा जिले में जहां डेरा मुख्यालय है, वहां भाजपा 5 में से चार सीटें हार गई थी, जबकि संसदीय क्षेत्र में 9 में 8 सीटों पर हार का मुंह देखना पड़ा। डेरा प्रमुख ने पहली बार अपना वोट डाला था।

सुनारिया जेल में बंद गुरमीत
25 अगस्त 2017 को साध्वी यौन शोषण मामले में सीबीआई की पंचकूला विशेष अदालत के सजा सुनाए जाने के बाद गुरमीत सिंह सुनारिया जेल में है। इसके बाद से डेरा में अधिकतर गतिविधियां ठप हैं। धार्मिक आयोजन बंद नहीं हुए। गुरमीत पैरोल पर बाहर आने के लिए सरकार से लेकर हाईकोर्ट तक गुहार लगा चुका है, लेकिन सुरक्षा की दृष्टि के मद्देनजर अनुमति नहीं मिल पाई।
पहला मौका जब बिना गुरमीत, रामपाल के चुनाव
2000 विधानसभा चुनाव के बाद यह पहला मौका है जब बिना गुरमीत सिंह और करौंथा आश्रम प्रमुख रामपाल की मौजूदगी के बिना चुनाव होगा। दोनों का ही राजनीति में दखल रहता आया है। इस बार दोनों सलाखों के पीछे से ही चुनावी हाल जानेंगे। रामपाल भी जेल में बंद हैं। हालांकि, दोनों के डेरों की आईटी टीमें सोशल मीडिया के जरिए अनुयायी बनाने में सक्रिय हैं। चुनाव घोषित होने के बाद इसमें तेजी आई है।

डेरा का साथ जानने को सब उत्सुक
सिरसा डेरा इस बार किसे अपना साथ देगा। ये जानने को सभी राजनीतिक दलों के साथ ही जनता में भी उत्सुकता है। डेरा भाजपा के साथ जाता है या फिर अपने पुराने साथी कांग्रेस के साथ, इस पर निगाहें लगी हुई हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में सिरसा डेरा ने पंजाब में कांग्रेस का समर्थन किया था।

डेरा के अकाली दल व इनेलो के साथ रिश्ते अच्छे नहीं हैं। डेरा पंजाब में अकालियों का विरोध करता रहा है। हरियाणा में इनेलो-शिअद का गठजोड़ चुनाव को लेकर हो चुका है। इस स्थिति में डेरा की राजनीतिक विंग का निर्णय काफी महत्वूपर्ण रहेगा।PLC.
 
 

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