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Friday, October 23rd, 2020

अर्जित नहीं 'प्रबंधित लोकप्रियता' के षड़यंत्र

- तनवीर जाफ़री -


भारत वर्ष में ऐसी अनेक हस्तियां गुज़री हैं जिन्होंने न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ज़बरदस्त लोकप्रियता हासिल की है। यह लोकप्रियता उन्होंने अपने जीवन दर्शन,कारगुज़ारियों अपने साहस व नीतियों ,अपने बलिदान,जीवन चरित्र व विचारों आदि के बल पर स्वतः अर्जित की है। इसके लिए सम्राट अशोक,महात्मा बुध,स्वामी विवेकानंद,महात्मा गाँधी,पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे अनेक नेताओं व मार्ग दर्शकों ने कभी किसी तरह का 'पी आर' या 'जनसंपर्क प्रबंधन' नहीं कराया। अपनी 'लकीरों' को बड़ा करने के लिए इन्होंने कभी किसी दूसरी लकीर को छोटा करने का प्रयास नहीं किया। आज दक्षिणपंथी सोच रखने वाले लोग व उनके समर्थक  जिस महात्मा गांधी व पंडित नेहरू पर तरह तरह के लांछन लगाकर उनके चरित्र हनन का प्रयास करते रहते हैं उनके समान क़ुर्बानियां देने वाला इनके पूरे 'वैचारिक कुनबे ' में एक भी नहीं। अन्यथा आज नर्मदा किनारे विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा लगाने के लिए कांग्रेस के ही नेता सरदार पटेल की प्रतिमा लगाने की ज़रुरत नहीं पड़ती। यदि कोई ऐसी प्रतिमा बनवाता भी है तो इसके लिए पहली-दूसरी व तीसरी सभी प्राथमिकताएं अपने दल,संगठन या विचारधारा के उन महापुरुषों या नेताओं की होंगी जिन्हें वह अपना आदर्श व प्रेरणा स्रोत मानता हो। न कि उस संगठन के किसी नेता की जिससे कि इतना  बैर हो कि पूरे देश को ही 'कांग्रेस मुक्त' किये जाने की बात की जा रही हो?
                                                   बहरहाल,'लोकप्रियता प्रबंधित' करने या 'अपने मुंह मियाँ मिट्ठू' बनने के इस खेल की शुरुआत पेशेवर तरीक़े से दो दशक पूर्व गुजरात से  हो चुकी थी। इसके पहले न ही कोई राज्य 'वाइब्रेंट',काँपता या थरथराता था। न ही किसी प्रगतिशील या विकसित राज्य को चुनाव के दौरान देश में किसी मॉडल के रूप में पेश किया जाता था। याद कीजिये वह दौर जब यदि दूर दर्शन के समाचार प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के चित्र सहित दो से अधिक समाचारों का भी वाचन कर देते थे तो पूरी 'दूर दर्शन' संस्था को ही 'राजीव दर्शन' का नाम दे दिए गया था। जब इंदिरा गाँधी ने 1975 में आपात काल लगाकर  देश के मीडिया पर नियंत्रण किया था उस समय उन्हें देश का सबसे बड़ा तानाशाह बताया गया था। आज तक आपात काल की सख़्तियों व तानाशाही को याद कर कांग्रेस विरोधी व आपात काल के भुक्तभोगी अपनी मासूमियत व अपने 'कथित लोकताँत्रिक संघर्ष' को याद कर इंदिरा गाँधी की तुलना हिटलर जैसे तानाशाह से करते हैं। कई राज्यों में तो आपातकाल के समय जेल जाने वाको पेंशन काले 'सेनानियों' भी प्रावधान किये जाने का समाचार है। परन्तु आज जबकि देश में कोई आपातकाल नहीं है,देश में  कथित तौर से पूरी आज़ादी व लोकतंत्र है। परन्तु देश का मीडिया आपातकाल से भी कई गुना ज़्यादा सत्ता का ग़ुलाम हो गया है। 'गोदी मीडिया' व चाटुकार व दलाल मीडिया जैसे शब्दों का चलन भी अब शुरू हुआ है। सत्ताधारी सांसद व नेता टी वी चैनल्स के मालिक बने बैठे हैं और एक सूत्रीय उद्देश्य पर चलते हुए सत्ता का गुणगान कर रहे हैं। उनके निशाने पर सत्ता नहीं बल्कि विपक्ष है। आए दिन उन पत्रकारों की हत्या हो रही है जो 'प्रबंधित लोकप्रियता' के मोह जाल में फंसने के बजाए पत्रकारिता का दायित्व निभाते हुए स्वतंत्र व निष्पक्ष होकर अपनी राय रखते हैं तथा सत्ता शासन व समाज सभी को आईना दिखाने का काम करते हैं।
                                                 परन्तु 'प्रबंधित लोकप्रियता' के अंतर्गत कभी विकीलीक्स के हवाले से गुजरात में ही अपनी झूठी तारीफ़ के पुल बांधे जाते हैं तो कभी प्रचार माध्यमों के द्वारा सैन्य उपलब्धियों का तमग़ा भी अपने नाम करने की कोशिश की जाती है। बाक़ायदा पूरा आई टी सेल 'प्रबंधित लोकप्रियता' अर्जित करने के काम में लगा हुआ है। अभी पिछले दिनों फ़ेस बुक को लेकर कितना शर्मनाक ख़ुलासा किया गया। किस प्रकार कथित तौर पर फ़ेस बुक की भारतीय मूल की कर्मचारी से मिली भगत कर अपनी छवि चमकाने,विपक्ष की छवि ख़राब करने यहाँ तक कि दिल्ली दंगे कराये जाने तक का घिनौना व अमानवीय षड़यंत्र रचा गया? यह सब कुछ 'प्रबंधित लोकप्रियता' अर्जित करने का ही घिनौना षड़यंत्र था। सर्वोच्च न्यायालय अयोध्या विवाद पर अपना निर्णय राम मंदिर के पक्ष में सुनाता है परन्तु इसका भी श्रेय सत्ताधारी ले रहे हैं। मीडिया इसमें सत्ता का न केवल साथ दे रहा है बल्कि वह स्वयं इस 'प्रबंधित लोकप्रियता' हासिल करने वाले षड़यंत्र का सिपाह सालार बनना चाह रहा है।आज देश का घरेलू सकल उत्पाद देश के इतिहास के न्यूनतम स्तर तक पहुँच गया है। देश में करोड़ों लोग बेरोज़गार हो चुके हैं। शिक्षित वर्ग के लोगों को नौकरी से अवकाश की आयु 50 वर्ष किये जाने का समाचार है जबकि नेताओं के अवकाश लेने  की कोई आयु नहीं? मंहगाई भी अपने चरम पर है। जनता भूखी प्यासी रहने व तंगहाली में आत्म हत्या करने  मजबूर हो रही है,शिक्षा की हालत बाद से बदतर हो रही है। कोरोना काल में देश बेहद ख़तरनाक दौर से गुज़र रहा है। परन्तु प्रबंधित मीडिया यही बता रहा है की चीन थर थर कांप रहा है, इमरान ख़ान की हवा निकल गयी है,विपक्ष कोमा में चला गया है,पूरा विश्व भारत के आगे दंडवत होने जा रहा है,अर्थव्यवस्था चुस्त दुरुस्त है,देश में राम राज्य आ गया है। आज देश की अनेक नव रत्न कंपनियाँ निजी हाथों में सौंपी जा रही हैं। रेलवे व हवाई अड्डे भी प्राइवेट हाथों में दिए जा रहे हैं, परन्तु 'प्रबंधित लोकप्रियता' के 'सेनानी' सब कुछ ठीक ठाक बता  रहे हैं । लॉक डाउन की शुरुआत में करोड़ों लोग बेरोज़गार व बेघर होकर सड़कों पर हज़ारों किलोमीटर पैदल चलते हुए अपने गांव-क़स्बे पहुंचे। रास्ते में सैकड़ों लोग दुर्घटना का शिकार हुए या भूखे प्यासे मर गए परन्तु  'प्रबंधित लोकप्रियता' के झंडाबरदारों को सरकार द्वारा ग़रीबों को दिया जाने वाला मुफ़्त का चना,चावल व गेंहू तो दिखाई दिया करोड़ों लोगों का दिन रात सड़कों पर भूख प्यास से परेशान होना व उनके पैरों के ज़ख़्म व छाले नहीं नज़र आए।
                                            परन्तु ऐसा लगता है कि 'प्रबंधित लोकप्रियता' के इस नाटक व षड़यंत्र की क़लई खुलने लगी है। सोशल मीडिया के जिन प्लेटफ़ॉर्मस पर यह सत्ताधारी इस लिए नाज़ करते थे कि इनके दर्शकों में पसंद करने व अनुयाइयों वालों की तादाद बढ़ती जा रही है उन्हीं सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मस पर अब पसंद के बजाए नापसंद करने वालों की तादाद पसंद करने वालों से कई गुना ज़्यादा हो गयी है। प्रधानमंत्री के 'मन की बात' से लेकर भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा व उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ व अब सत्ता समर्थन में प्रसारित होने वाले अनेक  कार्यक्रमों में यही देखा जा रहा है। देश के जो बेरोज़गार युवक प्रधानमंत्री के आह्वान पर कोरोना को भगाने के लिए 22 मार्च को शाम 5 बजे 5 मिनट तक अपनी ताली व थाली पीट रहे थे उन्होंने ही 5 सितंबर की शाम पूरे देश में अपनी अपनी थाली व ताली बजाकर सरकार के विरुद्ध अपना आक्रोश व्यक्त किया है। ज़ाहिर है प्रबंधित लोकप्रियता झूठ बोलकर सामयिक रूप से तो अर्जित की जा सकती है। झूठ की बुनियाद पर इसका अस्थाई साम्राज्य भी स्थापित किया जा सकता है परन्तु इससे न तो देश में बेरोज़गारी दूर हो सकती है न मंहगाई,न स्मार्ट सिटी बनाने के 7 वर्ष पुराने वादे पूरे हो सकते हैं न स्वच्छता अभियान व गंगा सफ़ाई अभियान का नारा अमल में लाया जा सकता है। न अर्थव्यवस्था सुधर सकती है न देश की क़ानून व्यवस्था में सुधार हो सकता है।'प्रबंधित लोकप्रियता' रेत पर बने  उस क़िले की तरह है जो कभी भी लोकतंत्र की आंधी में ढह सकता है।

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About the Author
Tanveer Jafri
Columnist and Author
Tanveer Jafri, Former Member of Haryana Sahitya Academy (Shasi Parishad),is a writer & columnist based in Haryana, India.He is related with hundreds of most popular daily news papers, magazines & portals in India and abroad. Jafri, Almost writes in the field of communal harmony, world peace, anti communalism, anti terrorism, national integration, national & international politics etc.
He is a devoted social activist for world peace, unity, integrity & global brotherhood. Thousands articles of the author have been published in different newspapers, websites & news-portals throughout the world. He is also recipient of so many awards in the field of Communal Harmony & other social activities.
Contact – : Email – tjafri1@gmail.com
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