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Friday, October 23rd, 2020

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो,ज़हर उगलने की नहीं

- तनवीर जाफ़री - 
 
 
समय समय पर देश और दुनिया में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर छिड़ने वाली बहस के क्रम में भारत की विभिन्न घटनाएँ एक बार फिर सुर्ख़ियों बटोर रही हैं। इन प्रमुख घटनाओं में गत 11 अगस्त को कर्नाटक राज्य के बंगलुरू शहर के उत्तर-पूर्वी उप नगर पुलकेशिनगर में हुई सांप्रदायिक हिंसा,12 अगस्त को एक टी वी स्टूडियो में हो रही बहस के उपरांत कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी की अचानक  तबियत बिगड़ना व उनका देहांत हो जाना तथा सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता व सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण को  उनके ट्वीट्स के लिए अदालत की अवमानना का दोषी पाया जाना आदि प्रमुख हैं। इन तीनों के घटनाओं के केंद्र में मुख्य रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही है। और इन तीनों ही घटनाओं ने फिर यही सवाल खड़ा कर दिया है कि आख़िर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कोई सीमा भी होनी चाहिए या नहीं ?यदि सीमा होनी भी चाहिए तो उसे निर्धारित कैसे किया जाए ?कौन निर्धारित करे ? क्या मापदंड हों सीमा निर्धारित करने के ? किसी की अभिव्यक्ति पर बंदिश लगाना मानवाधिकारों का हनन क्यों नहीं ? तो अपने मानवाधिकारों का इस्तेमाल करते हुए अभिव्यक्ति के नाम पर किसी दूसरे की भावनाओं को आहत करना,यह कैसी अभिव्यक्ति और कैसी उसकी स्वतंत्रता ? और यह भी कि इस विषय का निस्तारण राष्ट्रीय स्तर पर किया जाना चाहिए या यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली बहस व निवारण का विषय है ?
                                                 याद कीजिये 30 सितंबर 2015 का वह दिन जब डेनमार्क के एक प्रसिद्ध अख़बार जीलैंड पोस्टन ने इस्लाम धर्म के पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद पर आधारित 12 विवादित कार्टून्स को अपने संपादकीय पृष्ठ पर मुख्य रूप से प्रकाशित किया था। इसके विरुद्ध डेनमार्क से शुरू हुई हिंसा व प्रदर्शनों ने विश्व व्यापी रूप ले लिए था। भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में हिंसा आगज़नी,चर्चों पर हमले सांप्रदायिक हिंसा जैसी अनेक वारदातें हुई थीं। सितंबर 2005 से शुरू हुआ हिंसा का यह दौर फ़रवरी 2006 तक लगातार किसी न किसी देश में चलता ही रहा। नतीजतन 250 से ज़्यादा लोग इन प्रदर्शनों व हिंसा के दौरान मारे गए थे। अख़बार का कहना था कि 'उसने इस्लाम के विरुद्ध उठने वाले आलोचनात्मक स्वरों को बहस के लिए एक विषय उपलब्ध करने के मक़सद से यह कार्टून प्रकाशित किये थे। उनकी मंशा किसी व्यक्ति या समुदाय को आहात करने की नहीं थी'। परन्तु पूरे विश्व का मुस्लिम समुदाय भड़क उठा। उससे अपने पैग़ंबर का अपमान सहन नहीं हो सका। प्रायः विश्व में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकार के इस तरह के मुद्दों को लेकर बहस होती ही रहती है।
                             एक और घटना अमेरिका में पिछले दिनों घटी। राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की नीतियों के विरुद्ध राजधानी वाशिंगटन में एक विशाल प्रदर्शन हुआ। इसमें प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति ट्रंप की शक्ल के एक हवा भरे हुए पुतले को लेकर घूम रहे थे। वह पुतला पूरी तरह ट्रंप के नग्न शरीर के रूप में बनाया गया था तथा प्रदर्शनकारी उस हवा भरे नग्न रुपी पुतले को कभी जूतों से मारते तो कभी लातों से हमला करते। वे मार भी रहे थे और अप शब्द भी बोल रहे थे। न ही ट्रंप समर्थक इस प्रदर्शन का विरोध कर रहे थे न ही सत्ता की पुलिस उन्हें रोक रही थी। मैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उस स्तर को लेकर आश्चर्यचकित था क्योंकि इससे पूर्व मैंने किसी भी लोकताँत्रिक देश के राष्ट्राध्यक्ष का विरोधियों द्वारा ऐसा अपमान नहीं देखा था। याद कीजिये इसी अमेरिका में जुलाई 2010 में टेरी जोन्स नामक एक ईसाई पास्टर ने घोषणा की थी कि वह 9/11 की पहली बरसी पर क़ुरान शरीफ़ की 200 प्रतियाँ जलाएगा। उसकी इस घोषणा के विरुद्ध कई मध्य पूर्व व एशियाई देशों में हिंसा भड़की थी जिसमें लगभग 20 लोग मरे गए थे। बाद में काफ़ी अंतर्राष्ट्रीय दबाव पड़ने के कारण उसने यह कहते हुए अपना यह कार्यक्रम रोक दिया था कि अब वह भविष्य में कभी भी ऐसा करेगा ।
                            बंगलुरु में भी कुछ ऐसा ही हुआ। बंगलुरु के उत्तर-पूर्वी उप नगर में पुलकेशिनगर से कांग्रेस विधायक अखंड श्रीनिवास मूर्ति के भतीजे नवीन के फ़ेस बुक एकाउंट से कथित रूप से एक पोस्ट डाली गयी जिसमें हज़रत मोहम्मद का अपमान किया गया, बताया जा रहा है। जबकि नवीन का कहना है कि उसका अकाउंट हैक हो गया था जिसके बाद संभवतः किसी हैकर ने यह काम किया है। परन्तु इस तरह की सफ़ाई को सुनने समझने से पहले ही मुस्लिम समुदाय के लोगों ने उप नगर के एक हिस्से में हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया जिसमें पुलिस के कई उच्चाधिकारियों समेत लगभग 50 पुलिसकर्मी ज़ख़्मी हो गए। पुलिस द्वारा नवीन को भी गिरफ़्तार किया जा चुका है तथा हिंसा व आगज़नी में शरीक लगभग 110 आरोपियों को भी गिरफ़्तार किया जा चुका है। यहाँ भी न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाएं विवादित हैं बल्कि उन प्रदर्शनकारी उपद्रवियों की हिंसक प्रतिक्रिया भी सवालों के घेरे में है जिन्होंने उन संपत्तियों को  नुक़सान पहुँचाया जिनका इस विवाद से कोई लेना देना ही नहीं था। दूसरे यह भी कि आपत्ति जनक पोस्ट डालने का कथित आरोपी नवीन भी इस पोस्ट की ज़िम्मेदारी लेने से इंकार कर रहा था।
                            उधर राजीव त्यागी की अचानक हुई मृत्यु को लेकर भी एक वर्ग टी वी चैनल के पत्रकार रोहित सरदाना और भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा को ज़िम्मेदार बता रहा है। राजीव त्यागी की पत्नी का कहना है कि  राजीव त्यागी को संबित पात्रा ने 'जय चंद' कहकर संबोधित किया। उनके साथ अपशब्दों का प्रयोग किया। यह बहस बेंगलुरु हिंसा पर आधारित थी। संबित पात्रा ने त्यागी से यह भी को कहा था कि 'इन्हें अभी आग लगाने जाना होगा'। पात्रा ने तिलक लगाए हुए त्यागी पर व्यक्तिगत हमला बोलते हुए यह भी कहा की -'तिलक लगाने से कोई हिन्दू नहीं हो जाता'।इन्हीं अपशब्दों व बेहूदी बातों से राजीव त्यागी को घबराहट होने लगी और बाद में उन्होंने दम तोड़ दिया।  कुछ जगहों से पत्रकार सरदाना और भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा के विरुद्ध एफ आई आर कराए जाने की भी ख़बरें  हैं।
                              वहीँ सुप्रीम कोर्ट द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण को उनके कुछ ट्वीट्स  के चलते अदालत की अवमानना का दोषी क़रार दिया गया है। प्रशांत भूषण ने एक ट्वीट में कथित रूप से यह कहा था कि न्यायपालिका ने लोकतंत्र को बचाने के लिए कुछ नहीं किया। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश बोबडे की इस बात के लिए आलोचना भी की थी कि उन्होंने  कोरोना महामारी व  लॉकडाउन के दौरान अदालतों को बंद रखा। प्रशांत भूषण अपने इन ट्वीट्स को अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता व अपना मानवाधिकार बता रहे हैं जबकि अदालत की नज़रों में यह तौहीन-ए -अदालत का विषय है। यह भी देखा जा रहा कि टी वी डिबेट से लेकर सार्वजनिक मंचों तक बड़े ही सुनियोजित तरीक़े से इसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर समाज के अलग अलग वर्गों पर लक्षित हमले किये जाते हैं यानी ज़हर उगला जाता है। परन्तु उनको सत्ता संरक्षण होने की वजह से न ही किसी अवमानना का सामना करना पड़ता है न ही कोई क़ानूनी कारर्वाई होती है। सांप्रदायिक हिंसा चाहे बंगलुरु की हो या दिल्ली की क़तई निंदनीय है। समाज को बाँटने वाली ऐसी हिंसा का सर्वत्र विरोध किया जाना चाहिए। परन्तु साथ साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होनी चाहिए ज़हर उगलने की नहीं । 

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About the Author
Tanveer Jafri
Columnist and Author
Tanveer Jafri, Former Member of Haryana Sahitya Academy (Shasi Parishad),is a writer & columnist based in Haryana, India.He is related with hundreds of most popular daily news papers, magazines & portals in India and abroad. Jafri, Almost writes in the field of communal harmony, world peace, anti communalism, anti terrorism, national integration, national & international politics etc.
He is a devoted social activist for world peace, unity, integrity & global brotherhood. Thousands articles of the author have been published in different newspapers, websites & news-portals throughout the world. He is also recipient of so many awards in the field of Communal Harmony & other social activities.
Contact – : Email – tjafri1@gmail.com
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