Monday, December 9th, 2019

अब नफ़रत नहीं सौहार्द्र का प्रतीक बने अयोध्या    

 

- तनवीर जाफ़री - 

                                 

भारतीय इतिहास में सबसे लम्बे समय तक चलने वाले और सबसे विवादित मुक़द्द्मे पर अपना फैसला माननीय सर्वोच्च न्यायलय द्वारा सुना दिया गया है। इस फ़ैसले की सबसे बड़ी विशेषताएँ यह रहीं कि एक तो यह मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में गठित 5 सदस्यीय पीठ का सर्वसम्मत फ़ैसला है।दूसरा यह कि अपने फ़ैसले में माननीय उच्च न्यायलय किसी भी एक पक्ष की हार या जीत तय करने के बजाए दोनों ही धर्मों की भावनाओं का पूरा सम्मान किया। तीसरा यह कि विवादित स्थल हिन्दू भाइयों को सौंप कर विवादित विषय को हमेशा के लिए दफ़्न कर दिया। और मुसलमानों को अयोध्या में ही किसी प्रमुख स्थान पर 5 एकड़ ज़मीन देकर नई मस्जिद बनाने का आदेश दिया गया। अदालत के फ़ैसले से एक दिन पूर्व ही जिस प्रकार मुख्य न्यायाधीश ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव तथा प्रदेश पुलिस प्रमुख को तलब कर प्रदेश की संभावित क़ानून व्यवस्था से संबंधित वार्तालाप की व राज्य में क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने को लेकर निर्देश दिया व अयोध्या में सुरक्षाबलों की भारी तैनाती की गयी इससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि मुख्य न्यायाधीश, फ़ैसले के बाद पैदा होने वाली किसी भी अराजकतापूर्ण स्थिति को लेकर किस क़द्र चिंतित थे। उत्तर प्रदेश सहित देश के कई राज्यों में इस फ़ैसले के मद्देनज़र अलर्ट की स्थिति रखी गई थी। अयोध्या में तो अस्थाई जेलें तक बना दी गई थीं। परन्तु धर्मगुरुओं,राजनेताओं,मदरसों,मस्जिदों व सामाजिक संगठनों द्वारा जारी की गयी शांति व सद्भाव की अपील का ही परिणाम था कि पूरे देश में शांति का वातावरण बना रहा।

                                
बावजूद इसके कि अदालत ने 2.77 एकड़ की पूरी कि पूरी विवादित भूमि हिंदू पक्ष को राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण हेतु सौंप दी तथा मंदिर निर्माण हेतु केंद्र सरकार को तीन माह के भीतर एक न्यास गठित करने का निर्देश दिया। परन्तु अपने निर्णय में माननीय सर्वोच्च न्यायलय द्वारा जो बिंदु रेखांकित किये गए उनमें एक यह था  कि "मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाये जाने का कोई सुबूत नहीं मिला" । अब इस परिपेक्ष्य में यदि सैकड़ों वर्षों से बाबर का नाम लेकर मुसलमानों को निशाना बनाने की जो साज़िश हिंदूवादी संगठनों द्वारा रची गयी और मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाए जाने के इसी दुष्प्रचार के आधार पर पूरे देश में मुस्लिम विरोधी माहौल बनाया गया वह सरासर झूठा,फ़र्ज़ी व साज़िशन किया गया दुष्प्रचार साबित हुआ। अदालत की एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा गया कि "मस्जिद ग़ैर  क़ानूनी तरीक़े से तोड़ी गयी और मस्जिद में मूर्तियां ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से रखी गयीं" । फ़ैसले में शामिल यह टिप्पणी भी विवादित भूमि पर किसी भी प्रकार से क़ब्ज़ा हासिल कर लेने की अतिवादियों की चेष्टा तथा इसके लिए किये जाने वाले छल कपट पूर्ण प्रयासों का संकेत देती है। निःसंदेह अदालत ने जो फ़ैसला सुनाया है वह इस विवादित मामले को दफ़्न किये जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण क़दम है। परन्तु इस फ़ैसले की उपरोक्त दोनों टिप्पणियां भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुकी हैं जो रहती दुनिया तक इस बात का सुबूत बनी रहेंगी कि सत्ता प्राप्त करने के लिए किस प्रकार समाज को धर्मों के आधार पर बांटने की कोशिश की जा सकती है और सत्ता के चाहवान लोग किस तरह मानव मूल्यों की अवहेलना कर इंसान की लाशों पर सियासत किये जाने से भी नहीं चूकते।
                                       
अदालत ने मुस्लिम पक्षकार सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को मस्जिद बनाने हेतु अयोध्या में ही किसी प्रमुख स्थान पर पांच एकड़ ज़मीन दिए जाने का जो निर्णय सुनाया है वह भारतीय मुसलमानों व उनकी आस्थाओं का सम्मान किये जाने की एक कोशिश है। हालाँकि मुस्लिम पक्षकारों द्वारा इस पांच एकड़ ज़मीन को अस्वीकार किये जाने के समाचार सुनाई दे रहे हैं। परन्तु यह इंकार उचित नहीं है। यदि मुस्लिम पक्षकार सर्वोच्च न्यायलय के फ़ैसले को स्वीकार करते हुए किसी प्रकार की पुनर्विचार याचिका दायर न किये जाने की बात कह रहे हैं साथ साथ उन्होंने फ़ैसले से असंतुष्ट होते हुए भी देशहित में न केवल फ़ैसले को स्वीकार किया बल्कि पूरे मुस्लिम समाज से भी इस फ़ैसले के बाद सद्भाव बनाए रखने  की अपील की है उसी जज़्बे के तहत पांच एकड़ ज़मीन दिए जाने के अदालती आदेश को भी स्वीकार कर लेना चाहिए। निश्चित रूप से इस पांच एकड़ ज़मीन पर बनने वाली मस्जिद भारतीय मुसलमानों द्वारा देश की शांति,सद्भाव व एकता के लिए उठाए गए क़दम का प्रतीक बनेगी। इतना ही नहीं बल्कि देश में साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए रखने का तक़ाज़ा तो यह भी कहता है कि भारतीय मुसलमानों से जितना भी हो सके वे राम मंदिर के निर्माण में सहयोग देकर यह साबित करें कि यदि वे अपने आराध्य भगवान श्री राम को समर्पित भव्य मंदिर का निर्माण कर रहे हैं तो भारतीय मुसलमान भी अपने 'इमाम-ए-हिन्द' की याद में बनाए जाने वाले इस राम मंदिर में अपना भी यथा संभव सहयोग दे रहे हैं।
                                 
मुसलमानों का जो भी पक्ष इस फ़ैसले को लेकर संतुष्ट नहीं है उसे यह बात एक शाश्वत सत्य की तरह स्वीकार कर लेनी चाहिए कि देश में गत 30 वर्षों के दौरान जो स्थिति पैदा कर दी गयी थी उससे यह स्पष्ट होता जा रहा था कि भविष्य में इसी प्रकार का निर्णय आने वाला है। यदि अदालत द्वारा यह फ़ैसला न भी सुनाया जाता तो बहुमत की भाजपा सरकार संसद में क़ानून बनाकर राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ कर सकती थी। दूसरी तरफ़ गत तीन दशकों में मस्जिद निर्माण के पक्ष में मुसलमानों की निष्क्रियता व उदासीनता तथा मंदिर निर्माण हेतु  हिन्दू पक्षकारों की इन्हीं तीन दशकों से लगातार चल रही सक्रियता ख़ास तौर पर अयोध्या के कारसेवक पुरम में बड़े पैमाने पर चल रही पत्थरों की नक़्क़ाशी का काम यह बता रहा था की विवादित स्थल पर जब भी बनेगा केवल राम मंदिर ही बनेगा। इसलिए यह फ़ैसला अपेक्षित फ़ैसला ही था। दूसरी बात भारतीय मुसलमानों को यह भी समझनी होगी कि चूँकि यह स्थान विवादित हो चुका था या विवादित बना दिया गया था इसलिए भी यहाँ पुनः मस्जिद बनाए जाने की बात करना या विवादित स्थल पर नमाज़ अदा करने के बारे में सोचना भी न्यायसंगत नहीं था। कुछ मुसलमानों द्वारा यह तर्क भी दिए गए कि मस्जिद की जगह छोड़ी नहीं जा सकती। यह तर्क भी बेमानी है क्योंकि ईरान,सऊदी अरब,इराक़ और पाकिस्तान जैसे कई मुस्लिम बाहुल्य देशों के ही कई ऐसे उदाहरण हैं जहाँ कहीं विवादों के चलते तो कहीं विकास के नाम पर मस्जिदें  तोड़ी गयी हैं या अन्यत्र स्थानांतरित की गई  हैं।
                            
बहरहाल क़ाबिल-ए-तारीफ़ हैं वे भारतीय मुसलमान जिन्होंने पूरे सद्भाव,प्रेम व शांति के साथ हिन्दू मुस्लिम एकता का परिचय देते  हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को स्वीकार किया। और साथ साथ देश के शांति प्रिय नागरिकों के सोचने के लिए यह प्रश्न भी छोड़ दिया कि यदि अदालती निर्णय इसके विपरीत होता क्या तब भी देश में शांति बनाए रखने की कोशिशें कामयाब होतीं ?और 'मंदिर वहीँ बनाएँगे' का नैरा लगाने वाले लोग तब भी अदालत के फ़ैसले का सम्मान करने व देश में शांति व सद्भाव बनाए रखने की अपील कर रहे होते। और इस फ़ैसले ने एक सवाल यह भी कि छोड़ दिया है कि जब अदालत के अनुसार ही "मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाये जाने का कोई सुबूत नहीं मिला और "मस्जिद ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से तोड़ी गयी और मस्जिद में मूर्तियां ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से रखी गयीं", फिर आख़िर इतनी बड़ी साज़िश रचकर देश की शांति व सद्भाव को चार दशकों तक पलीता लगाने वाले सफ़ेदपोश लोगों को अदालत कब जेल की सलाख़ों के पीछे ढकेलेगी ? अयोध्या के नाम पर वोट बटोरने का खेल चूँकि अब ख़त्म हो चुका है लिहाज़ा  इस फ़ैसले के बाद अब अयोध्या को नफ़रत नहीं सौहार्द्र का प्रतीक बनना चाहिए।

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About the Author
Tanveer Jafri
Columnist and Author
Tanveer Jafri, Former Member of Haryana Sahitya Academy (Shasi Parishad),is a writer & columnist based in Haryana, India.He is related with hundreds of most popular daily news papers, magazines & portals in India and abroad. Jafri, Almost writes in the field of communal harmony, world peace, anti communalism, anti terrorism, national integration, national & international politics etc.
He is a devoted social activist for world peace, unity, integrity & global brotherhood. Thousands articles of the author have been published in different newspapers, websites & news-portals throughout the world. He is also recipient of so many awards in the field of Communal Harmony & other social activities.
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