रचनाएँ
1- एक आदत दुःख सहते रहने की
एक आदत कुछ न कहने की एक आदत चुप रहने की एक आदत घुट-घुटकर जीने की इससे वाकिफ हैं वे सारे इसलिए उन्हें हमसे डर नहीं है लेकिन देखो तो बबुआ को लटियाये बालों में कंघी काढ़ते कैसे घूरता रहता है जैसे उसकी आँखों में हों अनुत्तरित सवालों के नुकीले तीर क्या ऐसा नहीं लगता है ये नुकीले तीर किसी दिन छेद देंगे ज़रूर हमारी कातरता को ये विनम्रता जिसे संस्कार कहते हैं एक दिन सवालों की बौछार बनकर सींच ही डालेगी उम्मीदों के खेत और हम बेजुबान नहीं रहेंगे तब हम बोलेंगे हम सब बोलेंगे.......
  2- शोरोगुल, आहटें
सरगोशियाँ, सरसराहटें कनखियों से ताकना इशारे उगलियों के घूरना बेबात या कि तंज़िया मुस्कुराहटें क्या इतना काफी नहीं है ये साबित करने के लिए कि हम टारगेट किये जा रहे हैं...? आजकल ऐसा लगता है जैसे दिलो-दिमाग में बना रक्खा है घर एक ठोस से डर ने इतना ठोस और वज़नी है डर कि विस्फोटकों से भी न टूटे कोई मन्त्र, कोई तन्त्र किसी काम नहीं आ रहा.. तोड़कर सुरक्षा घेरा किसी घुसपैठिये सा आ पैठा है डर चुपचाप किसी कोने में उसे टारें तो टारें कैसे मैंने तुमसे भी तो पूछा, और तुम भी भयभीत ही थे इतने डरे हुए कि बोलने के प्रयास में थूक गुटकने लगे थे. हम डरते हैं उसे हटाने से या आजमाना नहीं चाहते नये अस्त्र-शस्त्र हमें शब्दों की शक्ति पर कितना भरोसा हुआ करता था शब्द जो लोरी थे, प्रार्थना थे जो इन्किलाब के नारे में तब्दील हो जाते या प्रेयसी से अभिसार की आशा करते या खेतों में पसीने की फसल उगाते थे लेकिन इस कठिन समय में नाकाफी हैं ये शब्द हमारे अन्दर बैठे डर को हटाने के लिए हडबडी में सायास लिखी कविताएँ कैसे मिमियाने लगती हैं उस डर के सामने इस असुरक्षित वर्तमान की कोख से बांधे बैठे उम्मीद हम कि उत्पन्न होगा एक सुरक्षित भविष्य दिवा-स्वप्न देखने की आदत ने खत्म कर दी हैं भरपूर नींद की संभावनाएँ... तो फिर क्या वाकई निराश रहा जाए?
3-  तुम
---------- किसी को मिलती नहीं जगह इतनी सी भी संसार में कि सुकून से उठ-बैठ सके चैन से बिता सके जीवन के दो चार पल जबकि तुमने बलात् ही जमा रखा है कब्ज़ा मेरे दिल में मेरे वजूद में इस तरह कि तुम्हें हटाना भी चाहूँ तो हटा नहीं सकता और तुम जाना चाहो तो इजाज़त दे नहीं सकता
4-  उम्मीद और ख़्वाब जैसे अलफ़ाज से
नहीं दीखती कोई निजात की सूरत ना-उम्मीदी जैसे बन गई हो स्थाई भाव और ख़्वाब तो तब आयें जब नींद आये ये समय किसी तरह से अपना नहीं है पहले भी समय अपना नहीं था लेकिन तब उम्मीद और ख़्वाब छोड़ते नहीं थे साथ जीवन की लौ हिलती-डुलती जलती तो रहती थी टिमटिमाती रौशनी में भी रास्ते सूझ ही जाते थे अब घनघोर अन्धकार है और अचानक बिजली की कौंध से कैसे तय हो सफ़र कि चकबकियाई आँखें भक्क से खुलती और झमक जाती हैं अँधेरा ठोस हो जाता है जैसे कि एक दीवार धडकनें बादलों की तरह गरजने लगती हैं साँसों से उठता है अंधड़.... ऐसे दुर्दांत समय में खोजता हूँ ] कोई हमनफस, कोई हमनवा कोई रहनुमा, कोई राहबर भूल जाता हूँ सच कि उम्मीदों की डोर टूट चुकी है कि उचटी नींदें ख़्वाब को खदेड़ चुकी हैं कि जीवन की टिमटिमाती ढिबरी हल्के से झोंके से बुझ सकती है कभी भी याद आती है माँ और उनकी खामोशियाँ हमेशा किसी न आने वाले का रास्ता तकती सवालों से भरी औचक निगाहें और मन ही मन करती स्वागत की तैयार याद आती हैं माँ खुलते जाते उम्मीदों के दर समाने लगते ख़्वाब जागती आँखों में... इसके अलावा कोई राह नहीं इसके अलावा कोई चाह नहीं....
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ANVAR-SUHEL1,अनवर सुहैलपरिचय - :
अनवर सुहैल
लेखक ,कवि व् शायर
मूलत: कवि कथाकार प्रकाशित किताबें कथा संग्रह : कुंजड कसाई, ग्यारह सितम्बर के बाद, चहल्लुम उपन्यास : पहचान , दो पाटन के बीच कविता संग्रह : और थोडी सी शर्म दे मौला सम्पादन : संकेत लघुपत्रिका
सम्पर्क : टाईप ४/३ आफ़ीसर्स कालोनी पो बिजुरी जिला अनूपपुर म- प्र- ४८४४४० फ़ौन ०७६५८ २६४९२० मो ०९९०७९७८१०८
सम्पति - : सीनियर मैनेजर , कोल इण्डिया लिमिटिड ______________________________________