आधी दुनिया और महिला आरक्षण विधेयक

Published on March 10, 2010 by   ·   2 Comments Print This Post Print This Post

आरफा राजपूत**

संसद में सरकार जिस भी पार्टी की  आये उस से कोई फर्क  नहीं पड़ता है. क्यूकी  नेता तो वही है.  उन की मानसिकता और सोच कभी नहीं बदल सकती है. आज का समाज जितना चाहे तरक्की   क्यू न कर  ले  पुरुष प्रधान समाज की सोच महिलाओ को को ले कर हर सदी में संकुचित ही रहेगी.
खैर!!! बात करते है मुद्दे की यानि की उस भूत की जो हमारे पुरुष प्रधान समाज के पुरुषो को रात दिन सोने नहीं देता. महिला मित्र मेरी बात को समझ गयी होंगी. जी हाँ!! हम  बात कर रहे है! महिला आरक्षण बिल की जिस ने संसद से ले कर सड़क तक सब की नीद हरम कर दी है. हमारी ताज़ा तरीन सरकार और महलाओ की सब से बड़ी हिमायत करने वाली सरकार ने अंतरास्ट्रीय महिला दिवस पर महिला आरक्षण बिल को पास कर के सरकार अपनी वाह वाही!! ले लेना चाहती थी. लेकिन विरोधी  राजनातिक  पार्टियो ने सरकार के इस मनसूबे पर पानी फेर  दिया. अगर हम  चुनावी आकड़ो की बात करे अबतक की लोकसभाओं की तुलना में पन्द्रहवीं लोकसभा में सबसे ज्यादा महिला सांसद आई । ये सकून की बात थी। उस से ये उम्मीद जागी थी की संसद में उस वर्ग के दर्द को बेहतर आवाज दी  जा सकेगी  जिसकी बेइंतहा उपेक्षा होती रहती है। इस बार  लोक सभा में जनता ने पहली बार संसद में पचास से ज्यादा  महिला प्रतिनिधियों को चुनकर भेजा था। हालांकि हालत 1995 से संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी तय करने के लिए जारी कोशिशों के अभी भी अनुरूप नहीं है। महिला आरक्षण विधेयक के प्रारूप में संसद के अंदर आधी दुनिया की 33 प्रतिशत आबादी सुनिश्चित करने की बात की जा रही है।
हां इस बार के चुनाव में इतना जरूर हुआ है कि जिस नेता  ने भी महिला आरक्षण बिल का विरोध किया था, मतदाताओं ने संसद में महिला आरक्षण का बेशर्मी से विरोध करते रहे कई नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। लालू, मुलायम और पासवान की तिकड़ी महिला आरक्षण का विरोध करती रही। पासवान को तो जनता ने आसमान दिखा दिया। लालू और मुलायम को भी हाशिए पर लगा दिया। जातिवादी राजनीति के बहाने आरक्षण का विरोध करने की पहलवानी करने वालों को अबकी बार धीरे से जोर का झटका लगा है। महिला आरक्षण का विरोध करने वालों की दलील  है कि महिला आरक्षण में भी जातिगत आरक्षण की व्यवस्था हो।  इस बार संसद की गरिमा तोड़ने में और बेहूदगी की जमात  में  जिन सांसदों ने अपना नाम शामिल  किया है  वो है सपा के कमाल अख्तर और मोहन सिंह.  जनता दल-यू से निलंबित एजाज अली और राजग के राजनीति प्रसाद.
नई पीढी बहुल मतदाताओं ने इस बार बता दिया था  कि विकास के फलसफे  के बगैर वोट नहीं देंगे। इससे जाति जाति का जाप करने वालों के मुंह पर पट्टी लगनी चाहिए थी लेकिन इतने से भी ये तिगड़ी  अपना साप के जैसा फन उठाये बगैर बाज़ नहीं आई आखिर दिखा ही दिया अपना असली चेहरा ।
सिर्फ जाति की आड़ में महिलाओं के आरक्षण का विरोध बंद होना चाहिए। क्योंकि यह आधी दुनिया की आबादी से जुड़ा है। इससे सबका सीधा वास्ता है। पुरुषों को पीछे धकेलने की नहीं समाज के उत्थान के मूल भावना से जुड़ी है। इससे शायद ही कोई राजी न हो कि विकास के लिए समाज में महिलाओं की दशा में तब्दीली आनी चाहिए। दबी कुचली और डरी सहमी नारी की तस्वीर बदलनी चाहिए। बेटा-बेटी के भेद के दस्तूर को इंसानी सभ्यता के बेहतर विकास के लिए बदलना होगा हमको,आपको हम सबको।
मतदाताओ ने सार्वजनिक जीवन में महिला की सहभागिता को बढाने के लिए इस बार राजनीतिक दलों से ज्यादा उदारता दिखाई  थी। ऊपरी तौर पर कांग्रेस,वामपंथी और बीजेपी संसद में महिला आरक्षण की पैरवी करती रही है। लेकिन जब टिकट बंटवारे का वक्त आया तो महिला प्रत्याशियों की हिस्सेदारी तय करने में सब आनाकानी करने लगे। 33 प्रतिशत टिकट महिला प्रत्याशियों को बांटने की बात पर सब बगले झांकने लगे। बेमानी तर्क दिया गया कि महिलाएं नहीं जीत पाएंगी और पार्टी का नुकसान हो जाएगा। इस तर्क का आधार राजनीति को सिर्फ दबंग और अपराधी तत्वों का धंधा मानना रहा। इस तर्क से अच्छे और बेहतर लोगों के राजनीति में आने का रास्ता रूकता है।
तैंतीस प्रतिशत ना सही फिऱ भी सबसे ज्यादा टिकट सोनिया गांधी की पार्टी ने महिलाओ को दिए। नतीजा सामने है। सबसे ज्यादा 19 महिला सांसद कांग्रेस से ही जीतकर आई हैं। इसमें बंसीलाल की पोती श्रुति चौधरी, नाथुराम मिर्धा की पोती ज्योति मिर्धा  और अब्दुल गनी खान की नातिन मौसम नूर भी शामिल हैं। तीनों ने पहली बार संसद का रास्ता देखा है।
सत्ता में आने का सपना चकनाचूर होने बिफरी बीजेपी को भी फायदा हुआ है। बीजेपी कांग्रेस की तुलना में कम महिला उम्मीद्बार उतारी थी। फिर भी संसद में बीजेपी की 11 महिला सांसद नजर आई। सीपीएम के मजबूत गढ़ को ढहाने में लगी ममता बनर्जी पार्टी से 5 महिला सांसद जीती थी, मायावती की बसपा से 4 और जनता दल से दो महिला सांसद जीतकर आई। संसद में रेणुका चौधरी की गैर मौजूदगी से महिला आरक्षण की धार को बड़ा नुकसान जरूर होता दिख। रेणुका चौधरी चुनाव हार गयी थी। फिर भी संतोष इस बात से जरूर किया जा सकता था  कि इस बार महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के बेहतर आसार दिख रहे थे। उम्मीद पिछली लोकसभा से भी थी। लेकिन वह भी इस में कामयाब नहीं हो पायी थी.  इस बार की लोक सभा में सोनिया गांधी के यूपीए अध्यक्ष के तौर पर इसका पैरोकार होना, बीजेपी की सुष्मा स्वराज का सबसे मुखर आवाज बनना और वामपंथियों में से वृंदा कारत का कमान सम्हालना महिला आरक्षण के बेहतर आसार लगे थे। संयोग की बात है कि आसार अब भी बन रहे थे।
विरोधियों का मुंह बंद होना चाहिए। खासकर पंचायतों में महिला आरक्षण ने समाज की तस्वीर बदलने की असरदार शुरुआत की है। गांव गांव में महिलाओं की पूछ बढ़ी है। महिला अगुवा के तौर पर स्थापित हो रही है!  इससे कई जड़ समस्याओं का निदान होता दिख रहा है। लेकिन समाज के ठेकेदार समस्याओ का निदान नहीं होने देना चाहते है. क्युकि इस बार जैसे ही महिला आरक्षण बिल पास होने के  लिए राज्य सभा में  वोटिंग का एलान हुआ  इस का भरी विरोध हुआ और संसद की गरिमा पर जो हुआ वह शर्मनाक था की आदरनी उपसभापति हामिद अंसारी के हाथ से बिल की कॉपी  छीन  ली  गयी. वही सपा, राजग ने समर्थन वापसी की धमकी दे डाली जिस से सरकार दर के मारे ’बिल’ में ही घुस गयी है. महिला आरक्षण बिल  कांग्रेस के निबटने ऐसी गले की हड्डी बन गयी है की न वो इस को निगल सकती है और न इसे उगल सकती है. क्युकि कांग्रेस का सब से बड़ा मुद्दा चुनाव में यही था की महिला आरक्षण बिल  पास कराया जायेगा. उअर इस के लिये सरकार ने इंटरनेशनल  विमेंस डे को  चुना. अगर देखा जाये तो ये महिलाओ का दिल तोड़ने के सिवा कुछ भी नहीं था. उन के लिये मुसीबते वैसे ही काम नहीं है.
इस बात को लोक सभा की अध्यक्षा मीरा कुमार से बेहतर  कोईं  समझ सकता है उन्होंने कहा है की ”यह भारत की संसद है, सभी समान्नित सदस्य है और हम कोई कार्वाही नहीं करना चाहते है! जो भी सदन में हुआ वह अवांछनीय  है.”
इस विरोध की सभी महिला सांसदों ने तो निंदा की है उस के साथ साथ सभी विद्वानों ने भी निंदा की है. हिन्दुस्तान के अरुण कुमार त्रिपाठी  कहते है कि  ”अगर लोहिया के बात करे तो आज महिला आरक्षण के सामने खड़ी बाधा मिटा ली जाये इस शताब्दी वर्ष में लोहिया को इस से अच्छी श्रधांजलि हो ही नहीं सकती.”
ये तो  रही बड़े लोगो कि बड़ी  बाते  और बयान बाज़ी लेकिन आने वाला कल  क्या  होगा महिला आरक्षण बिल  का ये तो वक्त को पता है या हमारे राज नेताओ को!

महिला आरक्षण बिल  अभी 186 मतों से सिर्फ राज्य सभा में पास हुआ है. लेकिन अभी इस को असली इम्तहान से गुज़रना बाकी है.

** lecturar & Ph.D scholar in Jamia Millia Islamia (Central University)New Delhi[She is also Radio anchor on AIR & Jamia Community Radio.]

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Readers Comments (2)
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