भारतीय रेल : कश्मीर घाटी का पुराना सपना हुआ साकार

Published on November 10, 2009 by   ·   9 Comments Print This Post Print This Post

हरीश कंवर

बारामूला से काजीगुंड के बीच 119 किलोमीटर लंबी रेल लाइन का काम पूरा होते ही भारतीय रेल ने पूरे देश और खास तौर से कश्मीर घाटी का पुराना सपना पूरा कर दिया है। अनंतनाग से काजीगुंड तक की 18 किलोमीटर लंबी रेल लाइन को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 28 अक्टूबर, 2009 को देश को समर्पित किया। अनंतनाग से बारामूला के बीच 101 किलोमीटर लंबे रास्ते पर चलने वाली रेलगाड़ी बहुत लोकप्रिय साबित हुई है और इसमें पांच हजार से ज्यादा यात्री रोजाना सफर करते हैं। अब अनंतनाग और काजीगुंड के बीच रेल सेवा से भी घाटी के लोग इसी तरह लाभान्वित होंगे। यह खंड शुरू होते ही बारामूला से काजीगुंड के बीच की 119 किलोमीटर लंबी रेल लाइन अब चालू हो गई है। इस रूट पर सोपोर, हमरे, पट्टन, मजहोम, बड़गाम, श्रीनगर, पंपोर, काकापोरा, अवन्तिपुरा, पंजगाम, बिजबियारा, अनंतनाग और सदूरा जैसे स्टेशन पड़ते हैं।
सभी तरह के मौसम में यातायात के एक भरोसेमंद विकल्प के तौर पर जम्मू कश्मीर को रेल मार्ग से शेष देश से जोड़ने के लिए रेल मंत्रालय ने जम्मू से बारामूला के बीच 345 किलोमीटर लंबे रेल मार्ग की योजना बनाई थी। यह रेल मार्ग ऊधमपुर, कटरा, रियासी, संगालदन, बनीहाल, काजीगुड, अनंतनाग और श्रीनगर से गुजरता है। यह परियोजना राष्ट्रीय महत्व की है। यही वजह है कि परियोजना के ऊधमपुर-बारामूला हिस्से को राष्ट्रीय परियोजनाएं घोषित किया गया और इसके लिए वित्त मंत्रालय द्वारा धनराशि उपलब्ध कराई जा रही है। ऊधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल संपर्क परियोजना (292 किलोमीटर) की अनुमानित लागत 11270 करोड़ रुपए है। इस परियोजना पर अब तक लगभग 5500 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। तेरह अप्रैल, 2005 को 53 किलोमीटर लंबी रेल लाइन जम्मू से उत्तर की ओर ऊधमपुर तक बढ़ाई गई। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने इसका उद्धाटन किया था। इसके बाद अक्टूबर, 2008 और फरवरी, 2009 में प्रधानमंत्री ने अनंतनाग के मजहोम (66 किमी.) और मजहोम से बारामूला (35 किमी.) लाइनों का भी उद्धाटन किया।
रेल विभाग को कटरा-काजीगुंड खंड परियोजना के लिए 262 किलोमीटर संपर्क सड़क की भी आवश्यकता थी ताकि निर्माण सामग्री और मजदूरों को पहुंचाया जा सके। इसमें 145 किलोमीटर लंबी सड़क यातायात के लिए खोल दी गयी है जिस पर नियमित रूप से गांवों को जोड़ने वाली बसें चल रही हैं। इस तरह यहां यातायात शुरू हो गया है और कोई भी गांव अब दूरस्थ नहीं रहा। अब मरीजों को आसानी से अस्पताल पहुंचाया जा सकता है, युवा वर्ग दूर स्थित शैक्षिक संस्थानों तक पहुंच सकता है और इस तरह अपने कैरियर की संभावनाओं को बेहतर बना सकता है। यह भी देखा गया है कि अब शादियां विभिन्न गांवों में रहने वालों के बीच होने लगी हैं, जबकि पहले यह एक ही जगह सीमित थीं। गांवों के स्थानीय उत्पाद अब शीघ्रता से शहरी बाजारों में पहुंचने लगे हैं। इससे उन लोगों को बेहतर अवसर मिलने लगे हैं जो दूरियों और यातायात के अभाव के कारण व्यापार अवसरों से वंचित थे ।
घाटी में रेल लाइन के निर्माण में लगभग 3250 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। मार्ग में 64 बड़े और 640 छोटे पुल हैं। रास्ते में 15 स्टेशन पड़ते हैं और सभी स्टेशनों पर यात्री सुविधाएं उपलब्ध हैं। स्टेशन की इमारतों का निर्माण स्थानीय वास्तुकला के अनुरूप सुन्दर तरीके से किया गया है। यह केवल देखने में ही सुन्दर नहीं बल्कि मौसम के अनुरूप भी हैं। इस रेल मार्ग का दूसरा दिलचस्प पहलू यह है कि इंजन-डिब्बों सहित सभी निर्माण सामग्री सड़क द्वारा पहुंचाई गई। परियोजना पूरी करने की यह दूसरी चुनौती थी।
कश्मीर घाटी में रेल सेवा से घाटी के लोगों के रहन-सहन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है। रेल केवल यातायात का साधन-मात्र नहीं है बल्कि इसके प्रभाव से समाज में भी बदलाव आता है। जैसे-जैसे दूरस्थ कस्बे, शहर और इलाके एक-दूसरे से जुड़ते जाते हैं, वैसे-वैसे साझा संस्कृति पैदा होनी शुरू हो जाती है। लोग रोजगार के लिए अन्य इलाकों में जाते हैं और वहीं रहने लगते हैं। इससे अंतर-देशीय प्रवास बढता है और क्षेत्रीय रुकावटें खत्म होती हैं। आज रेल की इन्हीं लौह पटरियों ने हमें एक-दूसरे के साथ मजबूती से जोड़ दिया है। वह दिन अब दूर नहीं जब घाटी की रेल भारतीय रेल के तंत्र से जुड़ जाएगी और देश के दूर-दराज के स्थानों से उसका संपर्क हो जाएगा।
(लेखक पसूका नई दिल्ली में उप निदेशक (रेल) हैं)

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