‘राम की शक्तिपूजा एवं रुद्रावतार’ समन्वय का राग

Published on June 19, 2009 by   ·   23 Comments Print This Post Print This Post

धीरंजन मालवे

 निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ और उद्भ्रांत रचित ‘रुद्रावतार’ बीसवीं सदी की चर्चित कृतियां हैं। ‘राम की शक्तिपूजा’ सन् 1936 में उन दिनों प्रकाशित हुई जब भारत पर अंग्रेज़ी शासन था। अंग्रेजी शासन के विरुध्द स्वतंत्राता संग्राम को निराला ने राम-रावण युध्द के रूप में देखा था। उन दिनों अंग्रेज़ों का दमन चक्र अपने चरम पर था और ऐसा प्रतीत हो रहा था कि राम-रावण संघर्ष में रावण राम पर भारी पड़ रहा है। ‘राम की शक्तिपूजा’ में राम शक्ति की आराधना करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर अपने कमल के समान नयन को भी दुर्गा मां को समर्पित करने को उद्यत हो जाते हैं। यही वह बिन्दु है जब दैवी शक्तियां राम के पक्ष में आ जाती हैं और विजय का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। निराला अपनी कविता के माध्यम से स्वतंत्राता सेनानियों को यह संदेश देते हुए प्रतीत होते हैं कि अंग्रेज़ों को पराजित करने के लिए शक्ति की साधना आवश्यक है और इस क्रम में उन्हें हर बलिदान के लिए तत्पर रहना होगा।

 कवि उद्भ्रांत ने ‘रुद्रावतार’ की रचना सन् 1990 में की। भारत तो आज़ाद हो चुका था मगर, रावण की आसुरी शक्तियों का साम्राज्य अन्य विभिन्न रूपों में था जैसे भ्रष्टाचार, दमन, मुनाफाखोरी, जमाखोरी, अपराधियों को संरक्षण इत्यादि। कवि उद्भ्रांत आसुरी शक्तियों द्वारा फैलाए जा रहे अनाचार और अत्याचार से उद्वेलित होते हैं और इसका निदान पौराणिक आख्यानों में ढूँढ़ते हैं। इस प्रकार ‘रुद्रावतार’ के रूप में कवि की कल्पना और अजस्र रचनात्मक शक्ति का आवेग फूट पड़ता है और हिन्दी साहित्य की एक कालजयी रचना सामने आती है।

 ’राम की शक्तिपूजा’ और ‘रुद्रावतार’ दोनों का संबंध रामकथा की परंपरा से है और दोनों का ही अंतिम लक्ष्य अत्याचारी रावण का वध करना है। मगर इस साम्य के बावजूद दोनों कविताएं बीसवीं सदी के अलग-अलग काल खंडों में लिखी गयी हैं। शिल्प और शैली में भी अनेक भिन्नताएं हैं। ऐसे में इन दो कृतियों का तुलनात्मक अध्ययन एक चुनौती भरा काम है। इस काम का बीड़ा मराठी भाषा युवा साहित्यकार शीतल शेटे ने उठाया है और वे इसके लिए बधाई की पात्रा हैं।

 इस पुस्तक को पढ़ते हुए पाठक एक अत्यंत सुखद और आनंददायक अनुभव से गुज़रता है। उसे दोनों रचनाकारों के संघर्षपूर्ण जीवन के बारे में तो जानकारी मिलती ही है, वह दोनों रचनाओं की कथावस्तु से भी परिचय पाता है और उनके रचना-विधान की बारीकियों से भी रूबरू होता है। प्राय: समीक्षकीय रचनाओं का पाठ दुरूह हो जाता है और एक सामान्य पाठक उन्हें अपनी रुचि के अनुकूल नहीं पाता है। मगर इस पुस्तक की रचना-शैली सहज और प्रवहमान है और पाठक को अंत तक बाँधे रखती है। यह अपने आप में उपलब्धि है।

 प्रथम अध्याय में हम निराला और उद्भ्रांत का जीवन-परिचय प्राप्त करते हैं। शीतल शेटे पहले उन्नाव जिले के गढ़ाकोला गांव में जन्मे बालक सुर्जकुमार के महाकवि निराला में रूपांतरण की यात्राा के चित्रा खींचती हैं और उनके निजी और साहित्यिक जीवन-यात्रा तथा उनसे जुड़े संघर्षों और उपलब्धियों से हमारा साक्षात्कार कराती हैं। तदोपरांत वे हमें कवि उद्भ्रांत की जीवन-यात्रा, पारिवारिक पृष्ठभूमि, शिक्षा, व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों, लेखकीय जीवन और साहित्यिक उपलब्धियों से परिचित कराती हैं। दोनों कवियों के निजी और साहित्यिक जीवन में जब वे साम्य की तलाश करती हैं तो पाती हैं कि दोनों ही कवियों ने आठ साल की कच्ची उम्र से ही कविता-रचना आरंभ कर दिया था और दोनों को छात्रा जीवन में अपने अध्यापकों की प्रशंसा मिली। दोनों ने ही अपने जीवन में संघषों का सामना किया। निराला के गुरू आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी थे तो उद्भ्रांत के गुरू हरिवंशराय बच्चन। दोनों ही कवियों में हम राष्ट्र प्रेम पाते हैं और दोनों ने ही राष्ट्र के ऊपर अनेक गीत लिखे हैं। दोनों ही कवि अपने परिवार के प्रति स्नेह रखते हैं। कवि निराला ने जहां अपनी पुत्राी की स्मृति में ‘सरोज स्मृति’ कविता लिखी थी वहीं कवि उद्भ्रांत ने अपनी तीनों बेटियों पर ‘तीन बहनें’ नाम कविता की रचना की।

 लेखिका ने दूसरे अध्याय में दोनों कविताओं की कथावस्तु और तीसरे अध्याय में कथावस्तु के मूल स्रोत तथा साम्य-वैषम्य की चर्चा की है। ‘शक्तिपूजा’ में राम-रावण युध्द की कथा है जिसमें राम द्वारा रावण के अद्भुत शौर्य से व्याकुल होकर विजय प्राप्त करने के लिए मां शक्ति की आराधना का वर्णन किया गया है। कई बड़े आलोचकों के अनुसार ‘रुद्रावतार’ ‘राम की शक्तिपूजा’ की पूर्वपीठिका है। ‘रुद्रावतार’ एक पौराणिक-सांस्कृतिक काव्य है जिसमें रावण के ध्वंस की भूमिका में श्रीराम के अतिरिक्त शिव और शक्ति के सहयोग की भूमिका को कथा-काव्य का रूप प्रदान किया गया है। लेखिका का मानना है कि दोनों कविताओं का लक्ष्य एक है और उनका अंत भी एक जैसा है। लक्ष्य है अत्याचारी रावण का वध। ‘राम की शक्तिपूजा’ में राम की आराधना से प्रसन्न होकर माँ शक्ति राम को विजयी होने का आशीर्वाद देती हैं और राम के मुखमंडल में लीन हो जाती हैं। ‘रुद्रावतार’ में शिव द्वारा एकादश रुद्र हनुमान के आगमन की घोषण सुनकर माँ शक्ति उसे अपनी पूरी सहायता देने का घोष करती हैं और फिर भगवान शिव के दिव्य तेज में लीन होती हैं। लेखिका के अनुसार इन एक-दो स्थलों के प्रतीकात्मक साम्य को छोड़कर दोनों कविताओं में कोई साम्य नहीं है। स्वयं उद्भ्रांत का भी कुछ ऐसा ही मानना है।

 चौथे अध्याय में शीतल शेटे दोनों कविताओं में रचना-विधान का तुलनात्मक अध्ययन करती हैं। उनकी मान्यता है कि दोनों ही काव्य समन्वयवादी हैं। दोनों में ही हमें शैव, वैष्णव और शाक्त मान्यताओं का समन्वय मिलता है। दोनों कविताओं के बीच एक महत्तवपूर्ण अंतर की ओर हमारा ध्यान खींचते हुए लेखिका बताती हैं कि ‘राम की शक्तिपूजा’ में प्रारंभ से लेकर अंत तक पूरे परिवेश में गहन अंधकार छाया है। ‘शक्तिपूजा’ की शुरूआत ही ‘रवि हुआ अस्त’ से होती है। ‘रुद्रावतार’ में पूरे परिवेश में प्रारंभ से लेकर अंत तक प्रकाश ही प्रकाश है और कविता की शुरूआत ही भगवान भुवनभास्कर के मुख झलकने से होती है।

 शीतल शेटे ने दोनों कविताओं के रचना-विधान, भाषा-शैली, प्रतीक-योजना और बिंब-विधान की गहराई से पड़ताल की है। डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय को उध्दृत करते हुए लेखिका कहती हैं कि ‘राम की शक्तिपूजा’ बहुस्तरीय अर्थ-योजना, जटिल और बारीक कीमियागिरी तथा सघन मूर्ति-विधान के मनोरम समारोह से युक्त है… वह अपनी क्लासिकी बुनावट, संदृष्टि घनत्व, अर्थ-वक्रता तथा बहुस्तरीयता के कारण जरा-मरण के भय  से ऊपर उठी हुई है। ‘रुद्रावतार’ के बारे में लेखिका का अभिमत है कि इसका रचना-विधान लंबी कविता के अनुशासन से व्यवस्थित है। पूरी कविता अपने नाटकीय-व्यापार, संवाद-प्रखरता तथा गीति-परकता के लिए जानी जाती है। भाषा-शैली पर अपनी टिप्पणी में लेखिका कहती हैं कि कवि उद्भ्रांत की भाषा ‘रुद्रावतार’ में आकर अपने संपूर्ण स्वर, नाद और सौंदर्य के साथ-साथ अनूठे छंद-विधान के कारण भी सबसे अलग, भीड़ से हटकर अपने अनुपम अस्तित्व का प्रतिपादन कर रही है। ‘रुद्रावतार’ के समग्र प्रभाव को लेकर लेखिका की मान्यता है कि यह अपने कथ्य, गीत-कथनात्मकता और छंदबध्दता के कारण प्रभावशाली बन पड़ी है, जिसे पढ़ते वक्त पाठक एक विशेष आह्लाद का अनुभव करता है। डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय से सहमत होते हुए लेखिका ‘रुद्रावतार’ में हिन्दी प्रदेश का ओज, संयम, पौरुष और जीवनास्था को समग्रता में विद्यमान पाती हैं।

 अंत में लेखिका अपनी स्थापना में कहती हैं कि ‘राम की शक्तिपूजा’ और ‘रुद्रावतार’ दोनों ही भिन्न स्तर और भिन्न कोण की कविताएं हैं, भले ही विषय की पौराणिकता, गीत-कथनात्मकता और छंद-सौष्ठव के आधार पर उनकी सीमित तुलना संभव हो। जहां ‘राम की शक्तिपूजा’ की कालजयिता प्रमाणित हो चुकी है, वहीं ‘रुद्रावतार’ को काल की कठिन परीक्षा से होकर गुजरना है।

 दोनों प्रतिष्ठित कविताओं की चुनौती का जो बीड़ा शीतल शेटे ने उठाया उसमें वे सफल रही हैं। जहाँ दोनों रचनाओं को तुलना की कसौटी पर परखने का उनका प्रयास फलीभूत हुआ है, वहीं वे स्वयं भी एक अच्छे समीक्षक की कसौटी पर खरी उतरी हैं। लेखिका को साहित्य के क्षेत्रा में एक लंबी यात्रा तय करनी है और अपनी साधना निरंतर जारी रखनी है। मैं उनमें एक समर्थ और ऊर्जावान विचारक, समीक्षक और साहित्यकार के सारे गुण  पाता हूं और आशा करता हूं कि हिन्दी साहित्य को समृध्द बनाने में वे लगातार प्रयत्नशील रहेंगी।
 
 इससे भी बड़ी बात यह है कि शीतल शेटे इस पुस्तक के माध्यम से उन लोगों को करारी चोट देती हैं जो राजनीतिक कारणों से मराठी-भाषियों और हिन्दीभाषियों के बीच विभेद और नफ़रत पैदा करना चाहते हैं। शीतल शेटे विभेद और नफ़रत की इस खाई को पाट रही हैं इस पुस्तक के माध्यम से। जहां हमें निराला और उद्भ्रांत में शैव, वैष्णव और शाक्तमतों के बीच अध्यात्मवादी समन्वय के दर्शन होते हैं, वहीं यह पुस्तक हमें राष्ट्रवादी समन्वय का अहसास कराती है और देश के उज्जवल भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है।

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